कहानी लंकापति रावण की

सारस्वत ब्राह्मण, पुलस्त्य ऋषि का पौत्र और विश्रवा का पुत्र रावण एक परम शिव भक्त ,उद्भट राजनीतिज्ञ , महापराक्रमी योद्धा , अत्यन्त बलशाली , शास्त्रों का प्रखर ज्ञाता प्रकान्ड विद्वान पंडित एवं महाज्ञानी था। जिसके बारे में स्वयं श्री राम ने कहा है, इस जैसा विद्वान न आज तक इस धरती पर पैदा हुआ है और न कभी होगा | रावण वाल्मीकि रामायण का महत्वपूर्ण पात्र होने के साथ साथ लंका का राजा भी था, उसके दश शिर थे जिस कारन उसे दशानन नाम से भी जाना जाता है | रावण के अंदर जो बुराइया थी उसके बारे में तो सभी जानते है आज बात करते है उसकी अच्छाइयों की रावण मे कितना ही राक्षसत्व क्यों न हो, उसके गुणों विस्मृत नहीं किया जा सकता। ऐसा माना जाता हैं कि रावण शंकर भगवान का बड़ा भक्त था। वह महा तेजस्वी, प्रतापी, पराक्रमी, रूपवान तथा विद्वान था।

वाल्मीकि उसके गुणों को निष्पक्षता के साथ स्वीकार करते हुये उसे चारों वेदों का विश्वविख्यात ज्ञाता और महान विद्वान बताते हैं। वे अपने रामायण में हनुमान का रावण के दरबार में प्रवेश के समय लिखते हैं

अहो रूपमहो धैर्यमहोत्सवमहो द्युति:।

    अहो राक्षसराजस्य सर्वलक्षणयुक्तता॥

आगे वे लिखते हैं “रावण को देखते ही राम मुग्ध हो जाते हैं और कहते हैं कि रूप, सौन्दर्य, धैर्य, कान्ति तथा सर्वलक्षणयुक्त होने पर भी यदि इस रावण में अधर्म बलवान न होता तो यह देवलोक का भी स्वामी बन जाता।”

  • एक महान शिवभक्त- रावण एक महान शिवभक्त था, और अपने तप से शिव को प्रस्सन किया था | एक बार अपने आराध्य को प्रस्सन करने के लिए अपना सर काट कर उनके चरणों में समर्पित कर दिया था और तब तक अपना सर समर्पित किया जब तक भगवान शिव ने खुद उन्हें दर्शन नहीं दिए रावण की इस भक्ति भाव से खुश होकर भोलेबाबा ने उसे दशशीश का वरदान दिया इसलिए ही रावण को दशानन नाम से जाना जाता है |

  • प्रकांड पंडित- ब्राम्हण पुत्र होने के कारन उसे वेदो का अच्छा ज्ञान था वो धर्म को मानने वाला प्रकांड पंडित भी था एक बार जब भगवन शिव ने पार्वती जी के लिए कुबेर के द्वारा भवन का निर्माण करवाया तो गृह प्रवेश के लिए रावण को आमंत्रित किया जहाँ माता के बार बार कहने पर रावण ने शिव के आदेशानुसार माता से उनका भवन ही दक्षिणा में मांग लिया |

  • संस्कारो का जनक– बहुत काम लोग ही ये बात जानते है की हिन्दू धर्म में जो संस्कार है उसकी शुरुवात रावण ने ही की जिसमे खून के रिश्तो में विवाह को निसिद्धा माना गया स्त्रियों के एक से ज्यादा सम्बन्धो पर रोक लगाई इस प्रकार कह सकते है हिन्दू धर्म में संस्कारो की शुरुवात लंकापति रावण द्वारा ही की गई|
  • त्रिलोक विजेता- प्रकांड पंडित होने के साथ साथ रावण एक पराक्रमी योद्धा भी था उसने तीनो लोको को जीत कर अपना अधिपत्य स्थापित किया था यहाँ तक की उसने काल को भी जीत लिया था अपने पराक्रम और ज्ञान की वजह से अपने भूत वर्तमान और भविष्य को देख सकता था रावण जानता था की श्री राम भगवान विष्णु के अवतार है फिर भी संसार को बुराई और अच्छाई का पाठ पढ़ाने श्री राम के हाथ से मरना स्वीकार किया |
  • महान रचनाकार- रावण एक महान रचनाकार भी था उसने ही शिव तांडव स्त्रोत लिखा है जो भगवान् शिव को अत्यंत प्रिय है एक बार नारद जी के कहने पे रावण को अभिमान हो गया की वो महापराक्रमी है साथ ही उसने कैलाश पर्वत अपने कंधे पे उठा लिया जिससे देवी सति ने उसे श्राप दिया की अपने अभिमान की वजह से तेरी प्रवृत्ति राक्षस की हो जाएगी माता के श्राप पे ध्यान न देते हुए रावण ने पुनः कैलाश को उठाने का प्रयास किया इस बार भगवान् शिव ने अपना वजन बढ़ा दिया जिससे वो मूर्छित होकर गिर गया जब उसे होश आया तो उसने महादेव की सुंदर स्तुती की ”जटाटवीगलज्जलप्रवाहपावितस्थले गलेऽवलम्ब्य लम्बितां भुजंगतुंगमालिकाम्.. जिसके फलस्वरूप भगवान प्रस्सन होकर तांडव नृत्य करने लगे और रावण को वरदान दिया जो भी ये तांडव स्त्रोत्र का पाठ करेगा भगवान् शिव की कृपा हमेशा उसपे रहेगी |

ऐसे थे महान विद्वान प्रकांड पंडित महापराक्रमी योद्धा अत्यंत बलशाली परम शिव भक्त लंकापति रावण

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