श्रावण माह और उसका महत्व

हिन्दू धर्म में श्रावण मास का बहुत ही महत्व है, हिन्दू पंचांग के हिसाब से ये वर्ष का पांचवा  मास है जो अपने साथ कई त्योहारों को लेकर आता है सावन के पूरे मास भगवान् शिव की आराधना की जाती है और सावन के प्रत्येक सोमवार को व्रत रखकर पूजा की जाती है श्रावण मास को मासोत्तम मास कहा जाता है. यह माह अपने हर एक दिन में एक नया सवेरा दिखाता इसके साथ जुडे़ समस्त दिन धार्मिक रंग और आस्था में डूबे होते हैं |

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हिंदु पंचांग के अनुसार सभी मासों को किसी न किसी देवता के साथ संबंधित देखा जा सकता है उसी प्रकार  श्रावण मास को भगवान शिव जी के साथ देखा जाता है इस समय शिव आराधना का विशेष महत्व होता है. यह माह आशाओं की पुर्ति का समय होता है जिस प्रकार प्रकृति ग्रीष्म के थपेडों को सहती उई सावन की बौछारों से अपनी प्यास बुझाती हुई असीम तृप्ति एवं आनंद को पाती है उसी प्रकार प्राणियों की इच्छाओं को सूनेपन को दूर करने हेतु यह माह भक्ति और पूर्ति का अनुठा संगम दिखाता है ओर सभी की अतृप्त इच्छाओं को पूर्ण करने की कोशिश करता है

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क्यों भगवान् शिव को प्रिय है श्रावण मास- श्रावण का महीना भगवन शिव को अत्यंत प्रिय है इसके पीछे कहानी है की जब भगवन शिव की पत्नी सती जो की राजा दक्ष की पुत्री थी अपने जीवन को त्याग कर कई वर्षो तक श्रापित जीवन को जीया उसके बाद हिमालय के घर पार्वती रूप में जन्म लिया तथा भगवन शिव को पति रूप में पाने के लिए पूरे श्रावण मास कठिन तप किया जिससे प्रसन्न हो भगवान शिव ने उनकी मनोकामना पूर्ण कर अपनी पत्नी के रूप में पुनः स्वीकार्य किया | अपनी भार्या से पुनः मिलन की वजह से ये माह उन्हें अत्यंत प्रिय है यहि कारण है की इस महीने कुंवारी कन्या अच्छे पति के लिए श्रावण के प्रत्येक सोमवार व्रत पूजन करती है |

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भगवान शिव को सावन का महीना प्रिय होने का अन्य कारण यह भी है कि भगवान शिव सावन के महीने में पृथ्वी पर अवतरित होकर अपनी ससुराल गए थे और वहां उनका स्वागत अर्घ्य और जलाभिषेक से किया गया था। माना जाता है कि प्रत्येक वर्ष सावन माह में भगवान शिव अपनी ससुराल आते हैं। भू-लोक वासियों के लिए शिव कृपा पाने का यह उत्तम समय होता है।

पौराणिक कथाओं में वर्णन आता है कि इसी सावन मास में समुद्र मंथन किया गया था। समुद्र मथने के बाद जो हलाहल विष निकला, उसे भगवान शंकर ने कंठ में समाहित कर सृष्टि की रक्षा की; लेकिन विषपान से महादेव का कंठ नीलवर्ण हो गया। इसी से उनका नाम ‘नीलकंठ महादेव’ पड़ा। विष के प्रभाव को कम करने के लिए सभी देवी-देवताओं ने उन्हें जल अर्पित किया। इसलिए शिवलिंग पर जल चढ़ाने का ख़ास महत्व है। यही वजह है कि श्रावण मास में भोले को जल चढ़ाने से विशेष फल की प्राप्ति होती है।

श्रावण मास के व्रत एवं त्यौहार- श्रावण मास में व्रत एवं त्योहारों का भी विशेष महत्व है इस मास में पड़ने वाले मुख्य व्रत और त्यौहार है |

हरियाली तीज – श्रावण मास के शुक्ल पक्ष की तृतीया को ये त्यौहार मनाया जाता है जिसमे विवाहित और कुंवारी कन्या निराहार व्रत रखती है तथा भगवान शिव व माता गौरी की पूजा की जाती है अपने पति की मंगल कामना और अच्छे वर की चाहत में ये व्रत रखा जाता है

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नागपंचमी – ये त्यौहार शुक्ल पक्ष की पंचमी को मनाया जाता है इसमें नाग पूजन का विशेष महत्व है |

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रक्षाबंधन- भाई बहिन के प्रेम का प्रतिक रक्षाबंधन भी श्रावण मास की पूर्णिमा को मनाया जाता है |

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इसके अलावा श्रावण में श्रावणी मेला कजरी तीज का भी अत्यधिक महत्व है श्रावण मास की शिवरात्रि और एकादशी भी शुभफलदायनी  है |

हरियाली का प्रतीक श्रावण मास– श्रवण मास को हरियाली का प्रतीक भी माना जाता है क्योंकि तपती गर्मी के बाद बारिश के माहौल खुशनुमा और हरा भरा हो जाता है इसलिए श्रावण मास में हरे वस्त्र,हरी चूड़ियाँ पहनने का भी रिवाज है माहेश्वरी समाज में तो हर पति अपनी पत्नी के लिए झूला सजाता है नए वस्त्र आभूषण देकर उसके प्रति अपने प्यार को दर्शाता है | प्रेम और मिलन के मास को श्रावण मास कहा जाता है |

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