कामाख्या देवी मंदिर

ये मंदिर लोगो के बीच हमेशा से आश्चर्य का प्रतिक बन कर रहा है और इसका सबसे बड़ा कारन है देवी का रजस्वला होना कहा जाता है आसाढ़ माह में देवी तीन दिनों के लिए रजस्वला होती है जिसके कारन यहाँ स्थित ब्रम्हपुत्र नदी का पानी भी लाल हो जाता है ये क्यों होता है कैसे होता है आज भी रहस्य है जो इस मंदिर के लिए लोगो के कौतुहल को बढ़ावा देता है |temple

आश्चर्य की बात है जिस देश में रजस्वला स्त्री अपवित्र मानी जाती है उसी देश के निवासियों की रजस्वला देवी को लेकर गहरी आस्था है और लाखो की भीड़ प्रतिवर्ष यहाँ लगने वाले अम्बुवाची मेले को देखने एकत्रित होती है |

कौन है देवी कामख्या- ये माता सती के ५१  शक्ति पीठो में एक है पौराणिक कथानुसार जब माता सती ने आत्मदाह किया तो उनके मोह में मोहित हो भगवान शिव ने उनके मृत शरीर को उठा कर तांडव शुरू किया जिसके फलस्वरूप संपूर्ण सृष्टि में हाहाकार मच गया सृष्टि को विनास की और जाता देख भगवान विष्णु ने शिवजी का मोह भंग करने हेतु अपने सुदर्शन से माता सती के शरीर को ५१ भागो में बाँट दिया जहाँ जहाँ भी ये अंग गिरे उसे शक्तिपीठ कहा गया उस समय जहां सती की योनि और गर्भ आकर गिरे थे आज उस स्थान पर कामाख्या मंदिर स्थित है। यह देवी के ५१ शक्तिपीठो में सबसे प्रमुख है | यहाँ कोई मूर्ति नहीं है अपितु स्त्री योनि के आकार की आकृति स्थित है जिससे निरंतर जल बहता रहता है  ऐसा माना जाता है कि ये पानी माता के रजस्वला होने का कारण होता है.इतना ही नहीं यहां दिया जाने वाले वाला प्रसाद भी रक्त में डूबा कपड़ा होता है. ऐसा कहा जाता है कि तीन दिन जब मंदिर के दरवाजे बंद किए जाते हैं तब मंदिर में एक सफेद रंग का कपड़ा बिछाया जाता है जो मंदिर के पट खोलने तक लाल हो जाता है. इसी लाल कपड़े को इस मेले में आए भक्तों को दिया जाता है. इस प्रसाद को अंबुवाची प्रसाद भी कहा जाता है.

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सती स्वरूपिणी आद्यशक्ति महाभैरवी कामाख्या तीर्थ विश्व का सर्वोच्च कौमारी तीर्थ भी माना जाता है। इसीलिए इस शक्तिपीठ में कौमारी-पूजा अनुष्ठान का भी अत्यन्त महत्व है। यद्यपि आद्य-शक्ति की प्रतीक सभी कुल व वर्ण की कौमारियाँ होती हैं। किसी जाति का भेद नहीं होता है। इस क्षेत्र में आद्य-शक्ति कामाख्या कौमारी रूप में सदा विराजमान हैं।

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इस क्षेत्र में सभी वर्ण व जातियों की कौमारियां वंदनीय हैं, पूजनीय हैं। वर्ण-जाति का भेद करने पर साधक की सिद्धियां नष्ट हो जाती हैं। शास्त्रों में वर्णित है कि ऐसा करने पर इंद्र तुल्य शक्तिशाली देव को भी अपने पद से वंछित होना पड़ा था।

कामाख्या मंदिर –कामाख्या मंदिर असम की राजधानी दिसपुर के पास गुवाहाटी से ८ किलोमीटर दूर कामाख्या में है। कामाख्या से भी १० किलोमीटर दूर नीलाचल पव॑त पर स्थित है। यह मंदिर शक्ति की देवी सती का मंदिर है। यह मंदिर एक पहाड़ी पर बना है व इसका महत् तांत्रिक महत्व है। प्राचीन काल से सतयुगीन तीर्थ कामाख्या वर्तमान में तंत्र सिद्धि का सर्वोच्च स्थल है। पूर्वोत्तर के मुख्य द्वार कहे जाने वाले असम राज्य की राजधानी दिसपुर से 6 किलोमीटर की दूरी पर स्थित नीलांचल अथवा नीलशैल पर्वतमालाओं पर स्थित मां भगवती कामाख्या का सिद्ध शक्तिपीठ सती के इक्यावन शक्तिपीठों में सर्वोच्च स्थान रखता है। यहीं भगवती की महामुद्रा (योनि-कुण्ड) स्थित है।kamakhya

कामाख्या से जुडी किवदंती–कामाख्या के शोधार्थी एवं प्राच्य विद्या विशेषज्ञ डॉ. दिवाकर शर्मा कहते हैं कि कामाख्या के बारे में किंवदंती है कि घमंड में चूर असुरराज नरकासुर एक दिन मां भगवती कामाख्या को अपनी पत्नी के रूप में पाने का दुराग्रह कर बैठा था। कामाख्या महामाया ने नरकासुर की मृत्यु को निकट मानकर उससे कहा कि यदि तुम इसी रात में नील पर्वत पर चारों तरफ पत्थरों के चार सोपान पथों का निर्माण कर दो एवं कामाख्या मंदिर के साथ एक विश्राम-गृह बनवा दो, तो मैं तुम्हारी इच्छानुसार पत्नी बन जाऊँगी और यदि तुम ऐसा न कर पाये तो तुम्हारी मौत निश्चित है।गर्व में चूर असुर ने पथों के चारों सोपान प्रभात होने से पूर्व पूर्ण कर दिये और विश्राम कक्ष का निर्माण कर ही रहा था कि महामाया के एक मायावी कुक्कुट (मुर्गे) द्वारा रात्रि समाप्ति की सूचना दी गयी, जिससे नरकासुर ने क्रोधित होकर मुर्गे का पीछा किया और ब्रह्मपुत्र के दूसरे छोर पर जाकर उसका वध कर डाला। यह स्थान आज भी `कुक्टाचकि’ के नाम से विख्यात है। बाद में मां भगवती की माया से भगवान विष्णु ने नरकासुर असुर का वध कर दिया।

कामाख्या के दर्शन से पूर्व महाभैरव उमानंद, जो कि गुवाहाटी शहर के निकट ब्रह्मपुत्र नदी के मध्य भाग में टापू के ऊपर स्थित है, का दर्शन करना आवश्यक है। इस टापू को मध्यांचल पर्वत के नाम से भी जाना जाता है, क्योंकि यहीं पर समाधिस्थ सदाशिव को कामदेव ने कामबाण मारकर आहत किया था और समाधि से जाग्रत होने पर सदाशिव ने उसे भस्म कर दिया था।

तंत्र सिद्धि और तंत्र विद्या का स्थल- अकसर यह सोचा जाता है कि तंत्र विद्या और काली शक्तियों का समय गुजर चुका है। लेकिन कामाख्या में आज भी यह जीवन शैली का हिस्सा है। अम्बुबाची मेला के दौरान इसे आसानी से देखा जा सकता है। इस समय को शक्ति तांत्रिक की दृष्टि से काफी महत्वपूर्ण माना जाता है। शक्ति तांत्रिक ऐसे समय में एकांतवास से बाहर आते हैं और अपनी शक्तियों का प्रदर्शन करते हैं। इस दौरान वे लोगों को वरदान अर्पित करने के साथ-साथ जरूरतमंदों की मदद भी करते हैं।

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मंदिर से जुडी अन्य रोचक बाते –

  • गर्भ गृह में देवी की कोई तस्‍वीर या मूर्ति नहीं अपितु चट्टान पे उभरी योनीनुमा आकृति की पूजा की जाती है जिससे निरंतर जल प्रवाहित हो रहा है |
  • तांत्रिक सिद्धि के लिए है ये बेहतर स्‍थान- यहाँ हमेशा तांत्रिको का डेरा लगा होता है जो मंत्र साधना के साथ लोगो की मदद भी करते है |
  • देवी के 51 शक्तिपीठ में है ये शामिल- देवी के ५१ शक्तिपीठो में इसे मुख्य स्थान प्राप्त है | देवी की महामुद्रा कहलाता है योनि रूप. पूरे ब्रह्मांड का माना जाता है केंद्र बिंदु.
  • हर माह तीन दिनों के लिए बंद होता है मंदिर – कहा जाता है इस वक़्त देवी रजस्वला होती है जिससे नदी का पानी लाल हो जाता है |
  • दस महाविद्या, काली, तारा, षोडशी, भुवनेश्वरी, छिन्नमस्ता, भैरवी, धूमावती, बगलामुखी, मातंगी और कमला की पूजा भी कामाख्या मंदिर परिसर में की जाती है.
  • यहां बलि चढ़ाने की भी प्रथा है. इसके लिए मछली, बकरी, कबूतर और भैंसों के साथ ही लौकी, कद्दू जैसे फल वाली सब्जियों की बलि भी दी जाती है.
  • पूस के महीने में यहां भगवान कामेश्वर और देवी कामेश्वरी के बीच प्रतीकात्मक शादी के रूप में पूजा की जाती है.
  • मंदिर का सबसे महत्वपूर्ण हिस्सा जमीन से लगभग 20 फीट नीचे एक गुफा में स्थित है.

दुर्भग्यपूर्ण बात ये है की हमारे देश में जहाँ ईश्वर के देवी स्वरूप को पूजा जाता है वही नारी को हर कदम पे हीन समझा जाता है | जहाँ नवदुर्गा में देवी  को पूजा जाता है दूसरी तरफ उसी कन्या रूप को प्रताड़ित किया जाता है भ्रूण हत्या जैसा गंभीर अपराध किया जाता है, जिस लक्ष्मी रूप को पूजा जाता है उसी लक्ष्मी को जन्म नहीं लेने दिया जाता समय समय पर उसकी इच्छाओ को मारा जाता है दहेज़ का बहाना बना जिन्दा जला दिया जाता है | माँ कामख्या के रजस्वला रूप को तो पूजते है किन्तु किसी रजस्वला स्त्री की परछाई को भी दूषित माना जाता है | पूजा करने से लेकर खाने तक हर चीज में रोक लगा दी जाती है |

मानवो की ये दोहरी भावना समझ से परे है एक और रजस्वला नारी पूजित दूसरी और दूषित

 

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