जगन्नाथ रथ यात्रा

भारत त्योहारों का देश है यहाँ का हर दिन कोई न कोई त्यौहार साथ लिए है भारत भर में मनाए जाने वाले महोत्सवों में जगन्नाथपुरी की रथयात्रा सबसे महत्वपूर्ण है। यह परंपरागत रथयात्रा न सिर्फ हिन्दुस्तान, बल्कि विदेशी श्रद्धालुओं के भी आकर्षण का केंद्र है। श्रीकृष्ण के अवतार जगन्नाथ की रथयात्रा का पुण्य सौ यज्ञों के बराबर माना गया है।पिछले 500 सालों से भगवान ‘जगन्नाथ जी’ की रथयात्रा निकाले जाने की परंपरा रही है।बता दें, जगन्नाथपुरी की विश्व प्रसिद्ध रथयात्रा का उत्सव आषाढ़ महीने के शुक्ल पक्ष की द्वितीया तिथि को मनाया जाता है। इस बार यह यात्रा 14 जुलाई 2018 से शुरू होने वाली है। इस रथयात्रा उत्सव के दौरान भगवान जगन्नाथ को रथ पर बिठाकर पूरे नगर में भ्रमण कराया जाता है।आइए जानते हैं आखिर क्यों और कैसे निकाली जाती है जगन्नाथ रथ यात्रा और क्या है इसके पीछे की पूरी कहानी।

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जगन्नाथ रथ यात्रा कैसे मनाई जाती है-  यह दस दिवसीय महोत्सव होता है। इस दस दिवसीय महोत्सव की तैयारी का श्रीगणेश अक्षय तृतीया को श्रीकृष्ण, बलराम और सुभद्रा के रथों के निर्माण से होता है और कुछ धार्मिक अनुष्ठान भी महीने भर किए जाते हैं।बहुत ही सुन्दर और भव्य रूप से सजाये हुए ये रथ, दिखने में मंदिर के जैसे दीखते हैं और जिस गली में इन्हें खिंच कर यात्रा होती है उस जगह को बडदांड कहते हैं। गुंडीचा मंदिर 2Km है मुख्य जगन्नाथ मंदिर से जहाँ से यह रथ यात्रा शुरू होती है।जगन्नाथ मंदिर में हिन्दुओं को ही घुसने की अनुमति है, परन्तु यही वो दिन है जिस दिन हर एक जाती और दुसरे देशों से आये हुए लोगों को भी प्रभु को देखने का मौका मिलता है। विश्व भर से पूरी रथ यात्रा पर आये हुए भक्त और श्रधालुओं की बस एक ही कामना होती है कि उन्हें एक बार प्रभु के रथ को रस्सी से खीचने का मौका मिले।jagannath1

जगन्नाथ, बलराम और सुभद्रा के रथ प्रति वर्ष नए बनाये जाते हैं। इन तीनों रथ को इनके यूनिक तरीके से सजाया जाता जो की सदियों से एक ही प्रकार एक ही रंग में सजाया जाते रहा है।

  • नंदिघोषा रथ-नंदिघोषा रथ भगवान श्री जगन्नाथ के रथ का नाम है। इसे गरुडध्वजा और कपिलध्वजा भी कहा जाता है। इसमें भगवान का साथ मदनमोहन देते हैं।16 पहियों वाला रथ 13.5 मीटर ऊंचा होता है जिसमें लाल व पीले रंग के कप़ड़े का इस्तेमाल होता है। विष्णु का वाहक गरुड़ इसकी हिफाजत करता है। रथ पर जो ध्वज है, उसे ‘त्रैलोक्यमोहिनी‘ कहते हैं।
  • तालध्वजा रथ -भगवान बलभद्र के रथ का नाम तालध्वजा, नंगलध्वजा है। इसमें उनका साथ रामकृष्ण देते हैं।तलध्वज’ के बतौर पहचाना जाता है, जो 13.2 मीटर ऊंचा 14 पहियों का होता है। यह लाल, हरे रंग के कपड़े व लकड़ी के 763 टुकड़ों से बना होता है। रथ के रक्षक वासुदेव और सारथी मताली होते हैं। रथ के ध्वज को उनानी कहते हैं। त्रिब्रा, घोरा, दीर्घशर्मा व स्वर्णनावा इसके अश्व हैं। जिस रस्से से रथ खींचा जाता है, वह बासुकी कहलाता है।
  • दर्पदलना रथसुभद्रा के रथ का नाम है दर्पदलना, देवदलन, पद्मध्वज है। रथ में देवी सुभद्रा का साथ सुदशन देता हैं।पद्मध्वज’ यानी सुभद्रा का रथ। 12.9 मीटर ऊंचे 12 पहिए के इस रथ में लाल, काले कपड़े के साथ लकड़ी के 593 टुकड़ों का इस्तेमाल होता है। रथ की रक्षक जयदुर्गा व सारथी अर्जुन होते हैं। रथध्वज नदंबिक कहलाता है। रोचिक, मोचिक, जिता व अपराजिता इसके अश्व होते हैं। इसे खींचने वाली रस्सी को स्वर्णचुडा कहते हैं।

इन रथो को हजारो लोग मिलकर खींचते है उनका मानना है इससे उनकी सभी इक्छाऐ पूरी पूरी होती है, और यही वो समय होता है जब भगवान को करीब से देखा जा सकता है |ये रथ यात्रा 9 दिनों तक चलती है। यह त्योहार खासतौर पर ओडिशा के पुरी में धूम-धाम से मनाया जाता है।

रथ यात्रा से जुड़े कुछ प्रमुख तथ्य –

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  • रथ यात्रा बहुत ही पौराणिक त्यौहार है और इसे भारत के साथ-साथ विश्व के दुसरे देशों में भी मनाया जाता है। खासकर डबलिन, न्यू यॉर्क, टोरंटो और लाओस में यह त्यौहार मनाये जाने में मशहूर है।
  • पोड पीठा इस त्यौहार का एक मुख्य मिठाई है जो बहुत ही प्रसिद्ध है।
  • तीनो भगवान जगन्नाथ, बलभद्र और सुभद्र को कुल 208 किलो ग्राम सोने से सजाया जाता है।
  • ब्रिटिश शासन के काल में जगन्नाथ रथ यात्रा के त्यौहार को जुग्गेरनट कहा जाता था इसके बड़े और वजनदार रथों के कारण।
  • आज तक जितनी बार भी रथ यात्रा मनाया गया है पूरी में हर बार बारिश हुई है।
  • विश्व भर में जगन्नाथ मंदिर ही ऐसा मंदिर है जहाँ से भगवान् के स्तूप या मूर्ति को मंदिर से बहार निकाला जाता है।
  • हर साल पूरी रथ यात्रा के तीनों रथों को पूरी तरीके से नया बनाया जाता है।

जगन्नाथ रथ यात्रा की कहानी- इस यात्रा के पीछे कई कहानिया है जैसे -कुछ लोगो का मानना है की श्री कृष्णा की बहिन सुभद्रा अपने मायके आती है और नगर भ्रमड़ की इच्छा व्यक्त करती है तब कृष्णा बलराम और सुभद्रा उन्हें रथ में लेके नगर भ्रमण को निकलते है, इसी के साथ जगन्नाथ रथ यात्रा की शुरुवात होती है |

इसके अलावा मान्यता है गुंडिचा मंदिर में स्थित देवी श्री कृष्ण जी की मासी है जो तीनो को अपने घर आने का निमंत्रण देती है कहा जाता है १० दिन के लिए श्री कृष्ण, सुभद्रा और बलराम जी उनसे मिलने को जाते है

जगन्नाथ रथ यात्रा का इतिहास- कहते हैं कि राजा इन्द्रद्युम्न, जो सपरिवार नीलांचल सागर (उड़ीसा) के पास रहते थे, को समुद्र में एक विशालकाय काष्ठ दिखा। राजा के उससे विष्णु मूर्ति का निर्माण कराने का निश्चय करते ही वृद्ध बढ़ई के रूप में विश्वकर्मा जी स्वयं प्रस्तुत हो गए। उन्होंने मूर्ति बनाने के लिए एक शर्त रखी कि मैं जिस घर में मूर्ति बनाऊँगा उसमें मूर्ति के पूर्णरूपेण बन जाने तक कोई न आए। राजा ने इसे मान लिया। आज जिस जगह पर श्रीजगन्नाथ जी का मन्दिर है उसी के पास एक घर के अंदर वे मूर्ति निर्माण में लग गए। राजा के परिवारजनों को यह ज्ञात न था कि वह वृद्ध बढ़ई कौन है। कई दिन तक घर का द्वार बंद रहने पर महारानी ने सोचा कि बिना खाए-पिये वह बढ़ई कैसे काम कर सकेगा। अब तक वह जीवित भी होगा या मर गया होगा। महारानी ने महाराजा को अपनी सहज शंका से अवगत करवाया। महाराजा के द्वार खुलवाने पर वह वृद्ध बढ़ई कहीं नहीं मिला लेकिन उसके द्वारा अर्द्धनिर्मित श्री जगन्नाथ, सुभद्रा तथा बलराम की काष्ठ मूर्तियाँ वहाँ पर मिली।महाराजा और महारानी दुखी हो उठे। लेकिन उसी क्षण दोनों ने आकाशवाणी सुनी, ‘व्यर्थ दु:खी मत हो, हम इसी रूप में रहना चाहते हैं मूर्तियों को द्रव्य आदि से पवित्र कर स्थापित करवा दो।’ आज भी वे अपूर्ण और अस्पष्ट मूर्तियाँ पुरुषोत्तम पुरी की रथयात्रा और मन्दिर में सुशोभित व प्रतिष्ठित हैं। रथयात्रा माता सुभद्रा के द्वारिका भ्रमण की इच्छा पूर्ण करने के उद्देश्य से श्रीकृष्ण व बलराम ने अलग रथों में बैठकर करवाई थी। माता सुभद्रा की नगर भ्रमण की स्मृति में यह रथयात्रा पुरी में हर वर्ष होती है।

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