गुरु पूर्णिमा

आसाढ़ मास की पूर्णिमा को गुरु पूर्णिमा के नाम से जाना जाता है, इस दिन गुरु पूजा का विधान है एक गुरु ही होता है जो हमे अज्ञानता के अंधकार से निकाल कर ज्ञानरूपी प्रकाश की और ले जाता है | आषाढ़ मास जो की वर्षा के प्रारम्भ का समय है तब न अधिक गर्मी होती है न ही अधिक ठण्ड ये समय विद्यार्जन के लिए सबसे उपयुक्त  समझा जाता है जैसे सूर्य के ताप से तप्त भूमि को वर्षा से शीतलता एवं फसल पैदा करने की शक्ति मिलती है, वैसे ही गुरु-चरणों में उपस्थित साधकों को ज्ञान, शान्ति, भक्ति और योग शक्ति प्राप्त करने की शक्ति मिलती है। इस पर्व की सहायता से अपने गुरु के प्रति कृतज्ञता को प्रकट किया जाता है |

Guru-Purnima

गुरु पर्व का इतिहास- कहा जाता है महाभारत के रचयिता महर्षि वेदव्यास जी का जन्म भी आसाढ़ पूर्णिमा को हुआ था जो महान ज्ञानी ऋषि थे वे संस्कृत के प्रकांड विद्वान थे और उन्होंने चारों वेदों की भी रचना की थी। इन्हे महर्षि व्यास के नाम से भी सम्बोधित किया जाता था इसलिए इसे व्यास पूर्णिमा भी कहा जाता है शास्त्रों में गु का अर्थ बताया गया है- अंधकार या मूल अज्ञान और रु का का अर्थ किया गया है- उसका निरोधक। गुरु को गुरु इसलिए कहा जाता है कि वह अज्ञान तिमिर का ज्ञानांजन-शलाका से निवारण कर देता है अर्थात अंधकार को हटाकर प्रकाश की ओर ले जाने वाले को ‘गुरु’ कहा जाता है।

“अज्ञान तिमिरांधश्च ज्ञानांजन शलाकया,चक्षुन्मीलितम तस्मै श्री गुरुवै नमः “

हमारे यहाँ गुरु का स्थान भगवान् से भी ऊँचा बताया गया है शास्त्रों के अनुसार जब भगवान् विष्णु ने श्री राम का अवतार लिया तो अपने मनुष्य रूप में अपने गुरु वशिष्ट जी के पैर भी दबाए, एक दोहा भी है

   गुरु गोविन्द दोउ खड़े, काके लागु पाँय !!

                                     बलिहारी गुरु आपकी ,गोविन्द दियो बताए !!

अर्थात बिना गुरु के भगवान तक नहीं पंहुचा जा सकता गुरु ही शिष्य का मार्ग प्रदर्शित कर उसे सफलता के मार्ग की और ले जाता है |

guru

हिन्दू शास्त्रों में गुरू की महिमा अपरंपार बताई गयी है। गुरू बिन, ज्ञान नहीं प्राप्त हो सकता है, गुरू बिन संसार सागर से, आत्मा भी मुक्ति प्राप्त नहीं कर सकती है। गुरू को भगवान से भी ऊपर दर्जा दिया गया है। चंद शब्दों में गुरू के प्रताप को बताया जाए तो शास्त्रों में लिखा है कि अगर भगवान से श्रापित कोई है तो उसे गुरू बचा सकता है किन्तु गुरू से श्रापित व्यक्ति को भगवान भी नहीं बचा पाते हैं।

guru_purnima

आषाढ़ मास की पूर्णिमा को गुरु पूर्णिमा के रूप में मनाया जाता है। गुरु पूर्णिमा को गुरु की पूजा की जाती है। पूरे भारत  में यह पर्व बड़ी श्रद्धा के साथ मनाया जाता है। प्राचीन काल में जब विद्यार्थी गुरु के आश्रम में नि:शुल्क शिक्षा ग्रहण करते थे तो इसी दिन श्रद्धा भाव से प्रेरित होकर अपने गुरु की पूजा का आयोजन करते थे। इस दिन केवल गुरु की ही नहीं किन्तु अपने घर में अपने से जो बड़ा है अर्थात पिता और माता, भाई-बहन आदि को भी गुरुतुल्य समझ कर उनकी पूजा की जाती है।

गुरुः ब्रम्हा गुरुः विष्णु गुरुः देवो च महेश्वरः गुरुः साक्षात् परमब्रम्ह तस्मै श्री गुरुवे नमः

अर्थात गुरु ही ब्रम्हा है ,गुरु ही विष्णु है और गुरु ही शिव है ,गुरु ही साक्षात् परमब्रम्ह है और ऐसे गुरु को मेरा नमस्कार है |बच्चो के माता पिता ही उनके पहले गुरु होते है जो उन्हें बोलना चलना और जरुरी संस्कार देते है इसलिए गुरु पर्व में गुरु के साथ साथ माता पिता के पूजन का भी विधान है या ये कहे हर वो इंसान जिसने हमे जीवन में जीना सिखाया हो या कोई भी ज्ञान प्रदान किया हो गुरु के समान ही है और वो हर व्यक्ति सम्मान का अधिकारी है चाहे वो बड़ा हो छोटा हो या कोई भी हो हर व्यक्ति से हम कुछ न कुछ अवश्य सीखते है |

Leave a Reply