वास्तविक या काल्पनिक

क्या वास्तविक क्या काल्पनिक सब धुँधला है|


एक धुँध जैसा है फैला हुआ दिमाग में, आखों के आगे। कुछ सोचने की कोशिश कर रही हूँ मगर कुछ नहीं समझ में आता|सही-गलत, अच्छा-बुरा, सच-झूठ, यहाँ-वहां, आना-जाना, आधा-पूरा ऐसा कितना कुछ है जिसे एक माहीन सी लाईन अलग करती है, एक दूसरे से जुदा करती है। सुनते हैं कि जिंदगी इन दोनों में फर्क करने में, सही रास्ता ढूंढने में ही गुज़र जाती है।

यहीं वो फैसलें हैं जो इन्सान को इन्सान से जुदा करते हैं, कामयाब और नाकामयाब में बाँटते हैं। लेकिन वो कहाँ जाए जिन्हें ये माहीन लाईन नजर ही नहीं आती हो, दिमाग दो चीजों में अंतर करना ही नहीं जानता हो, या यूं कहें कि कर ही न पा रहा हो, तो वो कहाँ जाए, क्या करे?

एक पल में लगता है कि कितना शोर है दिमाग में, मगर दुसरे ही पल लगता है कि कुछ भी नहीं है दिमाग में, बस एक अजीब सी खामोशी है। जितना शोर विचलित करता है, उतना ही यह सन्नाटा, यह खामोशी परेशान, बहुत परेशान, बहुत ज्यादा परेशान कर रही है। ये एक अजीब सी कश्मकश, शायद कश्मकश कहना सही नहीं होगा, मगर कुछ है| ये शोर और सन्नाटे में झूलती हुई मैं।

क्या ये सबके साथ कभी न कभी जिंदगी के किसी मोड़ पर ऐसा होता है क्या? कुछ समझ नहीं आ रहा, असल में यही समझ नहीं आ रहा कि समझना क्या है, क्या उलझा है जिसे सुलझाना है? ये धुँध छट जाए, इस से पहले कि, इस से पहले कि क्या?? ये भी नहीं पता कि धुँध का छटना क्यों जरूरी है, क्या होगा अगर धुँध छट गई तो? क्या मैं वास्तविकता और काल्पनिकता में अंतर करना भूल गई हूँ या उलझ के रह गई हूँ दोनों में?

Guest post by Pratyaya Singh

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