इंसानियत

क्या हम इंसान कहलाने लायक है ?

केरल के पलक्कड़ स्थित साइलेंट वैली नेशनल पार्क की मादा हाथी उमा 27 मई को मल्लापुरम की वेल्लियार नदी में मर गई | उसे विस्फोटकों से भरा अनानास खिला दिया गया था | अकल्पनीय दर्द के बीच तीन दिन तक ये मादा हाथी नदी में खड़ी रही और आखिरकार उसकी मौत हो गई|

वह गर्भ से थी, देश में ऐसी घटनाएं हो जाती है और हम आंख मूंद कर बैठे है और खुद को एक सभ्य समाज का हिस्सा समझ बैठे है। अगर इंसानियत ही नहीं तो क्या सच में इंसान कहलाने लायक है ? इस घटना ने आज दिल ग्लानि से भर दिया, खुद को इंसान कहने तक में शर्म आ रही है कि कैसे कोई इंसान, जिसके बारे में कहा जाता है कि वो ईश्वर की सबसे श्रेष्ठतम कृति है|

सबसे समझदार जीव ऐसी हरकत कर सकता है, वो भी उस जगह जिसे धरती का देवलोक कहा जाता हैं जो अपनी प्राकृतिक विविधता के लिए पूरी दुनिया में प्रसिद्ध है, जिसके बारे में कहा जाता है कि भारत में सबसे साक्षर प्रदेश है, जहां लोग अन्य जगह की तुलना में अधिक पढ़े लिखे है, अब तक तो मैं ये समझती थी कि पढ़ लिख कर इंसान संवेदनशील हो जाता है | मुझे नहीं पता था कि ये पढ़ाई कुछ और है|

ये कैसी पढ़ाई है, कैसी शिक्षा और कैसा शिक्षा का स्तर है| क्या इससे बेहतर वे सनातन संस्कार नहीं हैं, जिनकी शिक्षा सर्व प्राणी मात्र को कुटुंब मानने की सीख देती है| हर काम शुरू करने से पहले गजानन का नाम लेने वाला ये समाज ऐसा कैसे हो सकता है मुझे तभी इस समाज की शिक्षा की असलियत को समझ जाना चाहिए था जब मैंने यहां के लोगों को गौमाता को काट कर खाते देखा था। ये लोग कैसे खुद को इंसान कैसे समझ सकते है|

यह घटना किसी और देश की नहीं बल्कि हमारे भारतवर्ष की ही है, ये वही देश है जिसे ईश्वर ने बार बार अपने अवतारों के लिए चुना है जहां हर जीव में ईश्वर को मानने का रिवाज है उस देश में किसी जानवर की इस तरह निर्ममता से हत्या हो जाए तो इस सभ्य समाज से क्या उम्मीद की जा सकती हैं कुछ लोग कह रहे थे उसे अपने इलाके को नहीं लांघना चाहिए था कुछ का मानना है कि वो नुकसान पहुंचा रही थी, तो मानव समाज से में पूछना चाहती हूं कि ये बंधन तो तुमने बांधे है एक बेजुबान जीव अपनी हद को कहां पहचानता है|

रही बात नुकसान पहुंचाने की तो वो तो एक गर्भवती हथिनी थी जो खुदका और अपने अजन्मे बच्चे की भूख मिटाना चाहती थी, वो जंगल की पत्तियों से अपनी भूख मिटा रही थी ना की किसी गांव में किसी को नुकसान पहुंचा रही थी | उसकी गलती बस इतनी थी कि उसने इंसानों पर भरोसा किया उसके द्वारा दिए गए अनानास रूपी मौत को वो पहचान नहीं पाई और खुद शिकार हो गई|

एक गहरे जख्म ने बड़ी ही निर्ममता के साथ उसके मुंह, जबड़े, जीभ और दांतो को नुकसान पहुंचाया | इतनी पीड़ा में भी वो पागल नहीं हुई ना ही किसी को नुकसान पहुंचाया बस खड़ी रही नदी में हमारे द्वारा दिए गए जख्मों को शांत करने की कोशिश में असहनीय दर्द के साथ सिर्फ इसलिए ताकि एक नए जीवन को जन्म से सके पर अफसोस ये लड़ाई ज्यादा दिन चल नहीं पाई कोई उसकी मदद को नहीं आया और उसने तड़प तड़प के अपने अजन्मे शिशु के साथ नदी में प्राण त्याग दिए|

सोचिए कैसी पीड़ा होगी उस मां को अंतिम भाव क्या रहे होंगे एक मां के जो अपने शिशु की रक्षा का दायित्व नहीं उठा सकी, पर कहीं ना कहीं एक सुकून भी होगा मन में की अच्छा हुआ जो उसने बच्चे को जन्म नहीं दिया वरना कहीं और, कोई और अनानास उसे काल के ग्रास में लेकर जाने कि राह देख रहा होता । वो जहां भी होगी अपने बच्चे से जरूर ये कह रही होगी की अच्छा हुआ जो तुमने धरती पर जन्म नहीं लिया, तुम्हे इसका अफसोस नहीं होगा क्योंकि ये लोग बेजुबान जीव पर अत्याचार करने में कोई कसर नहीं छोड़ते|

यह लोग मानव के रूप में धरती पे घूमते हुए किसी जानवर के समान है।  किसी इंसाफ की जरूरत भी नहीं है |अपने पास रखिए अपने संविधान का अनुच्छेद 51 (ए), अपनी बड़ी-बड़ी अलमारियों में सजाकर रखिए कानून की किताबों को मुझे उम्मीद उनसे भी थी, जो पशु अधिकारों और अन्याय के लिए लड़ाई लड़ने का दावा करते है, संगठन चलाते हैं | कई विकास परियोजनाओं में मेरे अस्तित्व के नाम पर अड़ंगा लगाने वाले आज कहां हैं, कहां है वे, जो बस फर के कोट की मुखालफत करके हमारे अधिकारों की रक्षा कर लेते हैं| कहां हैं वो, जो हमसे हमदर्दी के नाम पर सरकार से, दुनिया से चंदा बटोर लेते हैं|

खैर जाने भी दीजिए इन बातो को कुछ दिन पहले जब किसी कुत्ते को किसी गार्ड द्वारा मारा गया पूरे देश में उसकी बहुत आलोचना हुई और कुछ दिन में सब शांत हो गया | स्थिती अब भी वही है कल कोई कुत्ता था आज हथिनी कल कोई और होगा यही है इस सभ्य समाज का सच|

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