पुरुसोत्तम मास की कहानी

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पुरुसोत्तम मास – जिसे मलमास या अधिकमास भी कहा जाता है | इसमें दान और पूजन का विशेष विधान है, हिन्दू संस्कृति में इसका विशेष महत्व है | इस पूरे महीने महिलाए व्रत, पूजन, दान जैसे विधान करती है | कहा जाता है इसे करने से समस्त दुखो का नाश हो जाता है |

  • मलमास – हमारे हिन्दू पंचांग के हिसाब से वर्ष में क्रमशः १२ महीने होते है | चैत्र, बैशाख, ज्येष्ठा, आसाढ़, सावन, भाद्रपद ,क्वांर, कार्तिक, अगहन, पौष ,माघ और फाल्गुन | हर महीने का एक स्वामी निर्धारित है, ये सभी दिन गिनने के बाद हिन्दुओ में ३५२ दिन होते है, जबकि पृथ्वी सूरज का एक चक्कर पूरा करने में ३६५ दिन का समय लेती है, तो हर वर्ष हिन्दू पंचांग के हिसाब से ११ दिन बचते है जो हर तीन वर्ष के पश्चात एक मास में परिवर्तित हो जाते है, इसीलिए हर तीसरे वर्ष मलमास होता है |

  • मलमास से पुरुसोत्तम मास बनने की कथा – पुराणों में मलमास के पुरुसोत्तम मास बनने की बड़ी रोचक कथा है मलमास का कोई स्वामी न होने के कारण उसे अधिकमास या मलमास कहा जाने लगा | बाकि अन्य मासो द्वारा मजाक उड़ाए जाने की वजह से मलमास दुखी हो गया और अपनी व्यथा नारद जी को सुनाई तब नारद जी उसे श्री कृष्णा के पास ले गए |

करुणासिन्धु भगवान ने उनकी व्यथा सुनकर उसे वरदान दिया की अबसे तुम्हे मेरे नाम से जाना जाएगा और मेरा नाम जुड़ जाने के कारण सभी दिव्य गुण तुममे समां जाएंगे | पूरी दुनिया में मुझे पुरुसोत्तम नाम से जाना जाता है इसलिए आज से तुम्हारा नाम भी पुरुसोत्तम होगा | इस मल मास का महत्व अन्य सभी मासो से ज्यादा होगा | इस पुरे मास लोग व्रत पूजन और दान करेंगे | इस वरदान के साथ ही मल मास को स्वामी मिले तथा उसका नाम पुरुसोत्तम मास पड़ा |

  • मान्यताएँ अधिक मास की अपनी कुछ मान्यताए है, जिसे हिन्दू धर्म में महत्वपूर्ण स्थान दिया जाता है जैसे –
  1.     अधिक मास में कोई भी शुभ कार्य नहीं किया जाता जैसे शादी, मुंडन, नामकरण इत्यादि | माना जाता है इस समय ग्रहो की महादशा बहुत ज्यादा प्रभावशाली हो जाती है |
  2. अगर किसी की राशि में कोई ग्रह दशा ख़राब हो तो अधिकमास में उसके पूजन का विशेष महत्व है |
  3. अधिक मास में दान का महत्व है इस माह में किया गया दान सर्वाधिक फल देने वाला है |

 

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