पलायन – प्रवासी कामगार

पलायन नाम सुनते ही लोगो के जेहन में 1947 का मंजर आंखो के सामने आ जाता था और हर व्यक्ति उसे सोच के भी भयभीत हो जाता था । हममें से किसी ने भी नहीं सोचा था कि इस तरह का दृश्य हम जिंदगी में दूसरी बार कभी देखेंगे ।

अब तक हिंदी सिनेमा में भारत पाकिस्तान के बीच के बंटवारे का पलायन दिमाग से निकला भी नहीं था कि कोरोना महामारी ने फिर वैसा ही दर्दनाक मंजर आंखो के सामने लाकर रख दिया और इस बार का पलायन आया मजदूरों के हिस्से में।

भारत में लॉकडाउन शुरू होने के हफ्तों बाद प्रवासी मजदूर घर वापस लौटने लगे हैं | उनके इन दिनों में जो अनुभव रहे हैं उनकी वजह से शायद ही वे जल्द काम पर लौटना चाहें | उनके अपने प्रदेशों में उनके भविष्य की कोई योजना नहीं है |कोरोना के कहर से पूरा विश्व थम गया है। देश के शहरों व गांवों की सड़कें और गलियां सुनी पड़ी हैं। इसी बीच ट्राइसिटी की फैक्ट्रियों में काम करने वाले मजदूर और भूखे प्यासे दिहाड़ीदार सैकड़ों किलोमीटर चलने के लिए बेबस हैं। उनके पास घर में बैठकर कोरोना वायरस से जंग जीतने के लिए कोई विकल्प नहीं है। उनकी जेब में न तो पैसे हैं और न ही खाने के लिए घर में राशन।

हां एक बात जरूर है कि कोरोना संक्रमण और मौत के काउंटडाउन के बीच अपने भविष्य को लेकर वे फिक्रमंद जरूर हैं। पंजाब और हरियाणा के बार्डर से सैकड़ों मजदूर अपने गांव-शहरों की तरफ निकल गए हैं। किसी को 100 तो किसी को 2000 किलोमीटर चलना है, रोजी रोटी का संकट सिर पर है। नंगे पैर, भूखे प्यासे समूहों में ये लोग निकल पड़े हैं। इस आस में पूरे दिन-रात इसलिए चले जा रहे हैं कि किसी तरह वे अपने घर पहुंच जाएं। 

आम आदमी जिस उम्मीद के साथ अपने सरकार को टैक्स जमा करता है कि ऐसी कठिन परिस्थिति में उसे इसका लाभ मिलेगा इस कोरोनावायरस ने इस उम्मीद का भी गला घोट दिया, हालांकि सरकार के अनुसार उन्होंने मजदूरों के हित में कई प्रयास किए जिन में उनके घर वापसी से लेकर उनके भोजन एवं रहने के प्रबंध की भी बाते सामने आई पर जमीनी हकीकत इससे कहीं अलग निकली ना ही मजदूरों तक भोजन पहुंच पाया ना ही संसाधन और बेबसी में शुरू हुआ पलायन ।

एक उम्मीद अपने घर पहुंच पाने की, एक उम्मीद की दो वक़्त का भोजन मिल पाए | इसी एक उम्मीद ने मजबूत कर दिया एक मजदूर को की वो 45 डिग्री तापमान में भी नंगे पैर बिना कुछ खाए पिए निकल गया | एक ऐसी यात्रा में जिसका अंत हो ना हो वो जानता भी है कि शायद कल का सुरज वो ना देख पाए किसी ट्रेन की पटरी या कोई अनियंत्रित ट्रुक उसकी जान ले सकता है, या भूख और गर्मी उसे बेहाल कर सकती है पर तब भी मजबुर है पलायन को हमे समझ नहीं आता हम कैसे समाज में रह रहे, जहां एक औरत को प्रसव के तुरंत बाद अपने बच्चे को गोद में लेकर चलते देखना हो या किसी बच्ची का अपने पिता को साइकिल में बिठा कर लंबी यात्रा का दृश्य हो कोई मजदूर कहीं बैल की जगह खड़े होकर बैलगाड़ी चला रहा हो ताकि अपने परिवार से मिल सके अगर ये तस्वीरें हमे विचलित नहीं करती तो सच में हम इंसान नहीं है और शायद भगवान भी आज अपनी बनाई मानव जाति पर शर्मिंदा होंगे।

जरा सोचिए ये समय चुनाव का होता तो हर घर में राशन उबलव्ध हो जाता यहां तक की जिस तरह वोट डलवाने के लिए पार्टी की गाडियां खड़ी हो जाती थी वो अब भी खड़ी हो सकती थी । पर इस देश के नेता बहुत अच्छे से जानते है भारत में चुनाव जरूरतों के आधार पर नहीं हिन्दू मुस्लिम मंदिर मस्जिद के आधार पर जीता जाता है ये बेचारे मजदूर तो वैसे भी भोले है फिर झूठे वादो के साथ इन्हे बेवकूफ बनाया जा सकता है। 

सरकार चाहती तो क्या ये पलायन रोक नहीं सकती थी, बिल्कुल रोक सकती थी अगर जमीनी स्तर पर कार्य करती तब अगर हर मजदूर को ये विश्वास दिला पाती कि संकट कि इस घड़ी में को उसके साथ है उसके रहने खाने का इंतजाम किया जा सकता था। जिस तरह अमीरजादों को विदेशों से लाने कि व्यवस्था कि है वो व्यवस्था मजदूरों के लिए भी की जा सकती थी पर क्या है ना वो है तो गरीब मजदूर ना ही वो भारतीय अर्थवयवस्थाओं का भाग है और ना ही वो चुनाव में पैसे दे सकता है तो क्या फर्क पड़ता है कुछ गरीब मजदूर मर ही जाएं।

ये सब देख कर दिल सोचने पर मजबुर हो जाता है कि क्या भगवान सच में है और अगर है तो सब होता हुआ देख क्यों रहे, कुछ करते क्यों नहीं। जाने ये पलायन कितने और बेबस मजदूरों की जान लेगा ।

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