डर – भाग 4

आप लोग पढ़ रहें हैं,  किस्से कहानियों के एक शहर गुलक में रहने वाली सहर की कहानी ।अब तक की कहानी के लिए पिछला अंक पढिए, अब आगे…..


शाम का वक्त है, सहर अपनी बाल्कनी में बैठी चाय का और ठंडी हवा का आनंद ले रही है । सामने एक बडा सा पार्क है जिसमें बच्चे खेल रहे हैं, कुछ लोग सैर कर रहे हैं तो कुछ जॉगिंग करते नजर आ रहे हैं, एक कौने में कुछ बुज़ुर्ग लोग एक गोल घेरे में खडे हुए खिलखिला कर हँस रहे हैं |सब कुछ कितना अच्छा लग रहा है, कितना सुकून भरा है सब कुछ, सहर ने मन ही मन सोचा और फिर अंदर से अपना लेपटाप ले आई| कुछ पल सोचने के बाद उसने लिखना शुरू किया ।


आज तीसरा हफ्ता है , व्यग्रता मुक्त जब मन खुश है, कोई डर कोई चिंता नहीं, किसी से कोई शिकायत नहीं, प्यार है खुद से प्यार ।
ऐसे लगता है जैसे कि मैं बस एक दिन सुबह उठी और मैंने खुद को आईने में देखा तो एक नई सहर खड़ी थी, मगर ऐसा नहीं है इसके पीछे कारण है और वो कारण हो तुम….तुम शस्वत। तुम्हारी वजह से धीरे-धीरे ही सही मगर जीने की चाह होने लगी है , खुद पर वापस यकीन होने लगा है, जैसी भी हूँ मैं वैसी ही अच्छी हूँ इस बात पर फिर से यकीन होने लगा है ।

मैं सिर्फ मैं बनकर भी जी सकती हूँ इस बात पर धीरे धीरे ही सही, विश्वास होने लगा है । खुद से खुद की पहचान होने लगी हैं, अपने होने पर यकीन होने लगा,  मैं भी जिंदा हूँ ये अहसास होने लगा है, मेरी भी कुछ अहमियत है, मेरा भी एक वजूद है |मेरी पहचान सिर्फ किसी की बेटी, बीवी या माँ तक सीमित नहीं है, पिछले कुछ सालों से भूल ही गई थी, अपनी पसंद नापसंद, क्या करने से खुशी मिलती है, एक वक्त ऐसा था जब प्रकृति से प्यार था, लेकिन कुछ सालों से डर लगता था प्रकृति के नजदीक जाते हुए भी, वहाँ की खामोशी बहुत डरावनी लगने लगी थी, शायद खुद से आँख मिलाने से डरती थी…. मगर आज प्रकृति के बीच रहने से एक सुकून की अनुभूति होती है, प्रकृति की खामोशी में खुद से नजर मिलाने में अच्छा लगने लगा है |


आज जब अपने आसपास देखती हूँ तो, तो शायद कुछ भी तो नहीं बदला है , लेकिन मैं …. मैं बदल गई हूँ, देखने का नजरिया बदल गया है ।समझ में आ गया है कि अपनी खुशी ढूंढने की जिम्मेदारी हमारी खुद की है, खुद को अहमियत देना, खुद के लिए जीना स्वार्थी होना नहीं है, बल्कि ऐसा करने से ही तो हम अपने परिवार को खुशी दे पाएंगे ।
उस दिन तुम्हारी बात मानकर मैंने बहुत अच्छा किया,  शायद मेरी जिन्दगी के बेहतरीन फैसलों में से एक । पहाड़ों में गुजारे दिन, प्रकृति के साथ, कितना सुकून कितनी शांती थी, खामोशी में प्रकृति का संगीत जैसे रूह तक को छू गया हो। अकेले जाने से, खोया हुआ आत्मविश्वास जैसे वापस पा लिया, अपने लिए जीना सीख लिया, अपने लिए फैसला लेना सीख लिया ।
मेरी खुद से पहचान करवाने के लिए शुक्रिया, मैं कहीं गुम गई थी,जीना भूल गई थी, जिंदगी से फिर से परिचय करवाने के लिए शुक्रिया
स्नेह
सहर


सेंड का बटन दबाकर सहर ने लेपटाप बंद कर दिया, उसके होठों पर मुस्कान तैर गई थी । फोन की घंटी बजी , बच्चों का फोन था दोनों कल घर वापस आ रहे हैं  सहर और सुधीर की शादी की सालगिरह जो है परसों । कुछ पल वहीँ बैठने के बाद सहर रसोई की तरफ चल दी, रेडियो पर गाना बज रहा है |


आज फिर जीने की तमन्ना है,
आज फिर जीने का इरादा है…..


सहर साथ साथ गुनगुनाने लगी और सोनी को बेसन घोलने के लिए कहा, सुधीर की पसंद के लौकी के कोफ्ते जो बनाने थे आज और अपने लिए आलू के पकोड़े …..बस इतनी सी थी कहानी, किस्से कहानियों के शहर गुलक में रहने वाली सहर की कहानी |

Be the reason someone smiles. Be the reason someone feels loved and believes in the goodness in people.

Guest post by Pratyaya Singh

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