डर – भाग 3

खुद को भी कभी महसूस कर लिया करो,

कुछ रौनकें खुद से भी होती हैं !!

सहर घर के गेट पर खड़ी सुधीर की जाती हुई गाडी को देखती रही, तब तक देखती रही जब तक कि गाडी आँखो से ओझल नहीं हो गई । फिर अनमने मन से घंटी बजाई, सोनी ने दरवाज़ा खोलते ही सवालों की बौछार लगा दी, दीदी कहाँ थी आप, मैं न जाने कब से आपको फोन कर रही हूँ । आपका बैग कहाँ है? फोन कहाँ है? मैं किसी भी बात का जवाब दिए बिना अपने कमरे की ओर बढ़ गई ।

मन बहुत बेचैन हो रहा था, कुछ समझ नहीं आ रहा था। सहर अभी भी शस्वत के बारे में ही सोच रही थी, इसी कशमकश में सहर ने सोचा कि नहा लिया जाए, शायद मन कुछ शांत हो जाए । सहर नहा कर कमरे में आई तो सोनी चाय की टरे लिए खडी थी, सोनी पिछले 10 साल से मेरे यहाँ काम करती थी, अब तो वो घर की सदस्या ही बन गई थी।मैंने चाय पी और क्लीनिक में फोन कर के बैग के छूट जाने की जानकारी दी ।

कुछ दिन बीत गए, एक दोपहर सहर अपने कमरे में चुपचाप बैठी दीवार पर लगी घडी की टिकटिक सुन रही थी । न जाने कब वो शस्वत के बारे में सोचने लगी, अकस्मात ही उसके  हाथ शस्वत का फोन नम्बर डायल करने लगे। फोन शस्वत ने ही उठाया  ” हेलो, हेलो! मैं…. मैं बोल रही हूँ ।” इस से पहले कि मैं कुछ और कह पाती,  शस्वत ने कहा कि वो मुझसे मिलना चाहता है ।

आज सहर एक अरसे के बाद मन से तैयार हो रही थी, उसने  हल्के प्याज़ी रंग की साड़ी पहनी, ऊपर से गहरे प्याज़ी रंग का शाल । गोल चेहरे पर लगी लाल बिंदी उसे और खुबसूरत बना रही थी, आईने में खुद को देखकर उसके होठों पर मुस्कान तैर गई ।

कैफे के अंदर पहुंच कर सहर शस्वत को ढूंढने लगी, शस्वत एक कोने में बैठा था, सहर उसके पास जाकर धीरे से बैठ गई। शस्वत एकटक सहर को देख रहा था, मुझे असहज होता देख उसने पुछा, क्या लोगी ? और फिर बिना जवाब जाने दो कप काफी ओडर कर दी, हमेशा की तरह । ऐसे ही तो किया करता था वो। मुझे कहीं गुम देख बोला, ” तुम आज भी काफी ही पीती हो न?” मैंने हाँ में सर हिला दिया । हम दोनों के बीच पसरी खामोशी काफी के कप रखने की आवाज़ से टूट गई ।

शस्वत ने कहना शुरू किया, ” क्या बात है, किस बात से परेशान हो? डाक्टर ने बताया था उस दिन कि तुम्हे पैनिक अटैक आया था ।” मैं नजरें झुकाए उसे सुन रही थी । वो कहता रहा,” देखो मैं तुम्हारी इस में मदद कर सकता हूँ , मैं खुद इस दौर से गुज़रा हूँ तो अच्छे से समझ सकता हूँ । तुम्हे डाक्टर की मदद लेनी चाहिए, और….और ।” इतना कहकर वो रूक गया, मैंने उसकी तरफ सवालिया नजरों से देखा, कुछ देर रूक कर उसने कहा,” तुम …..मममम तुम कुछ दिनों के लिए किसी पहाड़ी स्थान पर हो आओ, कुछ दिन सिर्फ तुम सहर बनकर जियो, न किसी की बीवी, न किसी की माँ, न किसी की बेटी , न किसी की दोस्त….कुछ नहीं सिर्फ तुम बनकर देखो। खुद को प्यार करना सीखो, खुद की इज्जत करना, खुद पर  यकीन  करना सीखो, अपनी अहमियत खुद जानो पहले, किसी और की मंजूरी का इंतजार मत करो। यकीन करो जब खुद के साथ खुश रहना सीख जाओगी तब तुम्हारे आसपास भी सब ठीक हो जाएगा ।”

क्या सहर शस्वत की बात पर गौर करेगी,क्या वो खुद को खोज पाएगी? ये जानने के लिए इंतजार कीजिए कहानी के अगले और अंतिम भाग का….

अभी के लिए बस इतना ही ….. 

Guest post by Pratyaya Singh

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