डर – भाग 2

इत्तेफाक कि बात है
इत्तेफाक होते भी
इत्तेफाक से हैं

आप लोग पढ़ रहें हैं,  किस्से कहानियों के एक शहर गुलक में रहने वाली सहर की कहानी । अब तक की कहानी के लिए पिछला अंक पढिए| अब आगे –


सहर ने जब आँखे खोली तो खुद को किसी घर में पाया, मगर ये घर जाना पहचाना न था, वो एकदम से घबरा कर उठ बैठी, इस से पहले कि वो कुछ समझ पाती, उसने एक जाना पहचाना सा चेहरा अपनी और आता दिखाई पड़ा | ये तो शायद ,उसने मन ही मन में सोचा, लेकिन कुछ कह नहीं पाई |

उस चेहरे ने पास आते हुए पूछा “अरे!  तुम जग गई?”…. “तुम” ये सुनते ही सहर के मुँह से अकसमस एक नाम निकला ” शस्वत” !! क्या ये वाकई शस्वत है? मैं  अभी इसी उलझन में थी कि शस्वत एकदम पास आ गया, मेरी और चाय का कप बढाते हुए, पास पडी कुर्सी पर बैठ गया  । अब कैसा महसूस कर रही हो? मैंने संकोच से पुछा ,” मैं यहाँ कैसे? मैं तो , मैं तो शायद “। “तुम सडक के बीच गिर गई थी, मेरा घर पास में ही था तो तुम्हे यहीं ले आया, मगर फिक्र की बात नहीं है, डाक्टर देख कर गया है, बोला है तुम्हे आराम की जरूरत है,” शस्वत ने कहा ।

आज भी उसकी आवाज़ में वही खनक थी, जो आज से 25-26 साल पहले थी। चेहरे पर वही चमक, बस अब उसकी आँखे चश्मे के पीछे छुप गई थी । ”अच्छा सुनो तुम अपने घर फोन कर लो,” और उसने यह कहते हुए अपना फोन मेरी और बढा दिया । तभी मुझे याद आया कि मैं जब डाक्टर के यहाँ से निकली थी तो अपना फोन,  अपना पर्स वहीँ छोड़ आई थी ।


मैंने सुधीर को फोन लगाया और उसे सब बात बताई, वो शायद  घबरा गया था । मैंने उसे घर का पता SMS कर दिया,  इतने में शस्वत कमरे में दाखिल हुआ, उसके हाथों में खाने की थाली थी । मैंने इधर उधर देखा मुझे घर में कोई नजर नहीं आ रहा था, मेरे मन की बात भांपते हुए उसने कहा, ” तुम खाना खाओ पहले,  काकी है रसोई में वही मेरे लिए खाना बनाती है, अच्छा  बनाती है,तुम्हे  अच्छा लगेगा”! खाना खा कर मुझमें थोड़ी जान आई….” तुम्हारी फैमिली कहाँ है?” उसने कुछ नहीं कहा, बस एकटक मेरी तरफ देखने लगा, इस से पहले कि मैं कुछ समझ पाती, दरवाज़े पर बजी घंटी ने ध्यान अपनी और खींच लिया ।

दरवाज़े पर से आती आवाज़ जानी पहचानी थी, शायद सुधीर आ गया था । हाँ, सुधीर ही है, मैंने शस्वत की तरफ देखते हुए कहा, दोनों में औपचारिकता पूरी हुई और सुधीर ने शस्वत को धन्यवाद कहते हुए मुझे जल्दी से चलने के लिए कहा, ” डाक्टर ने ये पर्ची दी है ,” ये बोल शस्वत के मुँह में ही थे, मैंने सुन लिया था मगर सुधीर, सुधीर तो कब का जाकर गाडी में बैठ गया था । मेरी शस्वत को देखने की हिम्मत नहीं हुई, इसलिए चुप चाप जा कर गाडी में बैठ गई । मैंने गाडी के शीशे में झाँका तो शस्वत की निगाहें मुझ पर ही टीकी हूई थी, मैंने नजरें झुका ली । कानों में सुधीर की गुस्से भरी आवाज़ पडी तो, वो शायद कोई जरूरी मीटिंग छोड़ कर आया था, बहुत गुस्से में था,  “जानती हो आज कितनी जरूरी मीटिंग थी, तुम टैक्सी करके आ जाती,  और तुम्हारा फोन कहाँ है ? ” वो बोले जा रहा था,  बिना जवाब का इंतजार किए ।

अकसर ऐसे ही तो वो करता था । मैं गाडी से बाहर झाँकने लगी, ध्यान बार बार शस्वत की ओर जा रहा था। कभी सोचा न था कि यूँ मुलाकात होगी, इतने सालों बाद । अजीब सी खुशी और बेचैनी थी मन में, उसे यूँ मिलने के बाद । उसने अपनी फैमिली के बारे में कुछ बताया क्यों नहीं, क्या वो आज भी? नहीं नहीं, ये मैं क्या सोचने लगी ।

आखिर सहर और शस्वत में ऐसा क्या था जो सहर को खुशी और बेचैनी के झूले में झूला रहा था । ये जानने के लिए इंतजार कीजिए कहानी के अगले अंक का । अभी के लिए बस इतना ही

Guest Post by Pratyaya Singh

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