डर – भाग 1

जितनी भीड़ बढ़ रही है इस दुनिया में लोग उतनें ही अकेले होते जा रहे है !


आइए आपसे किस्से कहानियों के शहर गुलक में रहती सहर का किस्सा साँझा करती हूँ ।

सहर यहाँ अपने पति और दो बच्चों के साथ रहती है, सबकुछ ठीक चल रहा था लेकिन कुछ समय से सहर चुप चुप सी रहने लगी थी, पहले पहले उसे लगा शायद खालीपन की वजह है, पति अपने काम में व्यस्त रहते हैं, और बच्चों की अपनी दुनिया है, वो कोशिश करती है उन सबकी जिंदगी का हिस्सा बन पाए मगर नहीं कर पा रही और नतीजा यह है कि वो आज मनोवैज्ञानिक के कमरे में बैठी अपने डर, अपने अकेलेपन का हल ढूंढने की जद्दोजहद में है ।

डाक्टर के पूछने पर कि क्या ऐसा है जिस से वो डरती हैं, सब तो हैं फिर क्यों खालीपन महसूस होता है, पहले तो वो चुप रही , फिर न जाने कैसे शब्द खुद-ब-खुद उसका डर बयाँ करने लगे। बहुत अजीब लग रहा है, बहुत अकेला, ऐसा लग रहा है जैसे कोई छोटा बच्चा किसी बहुत बड़े मेले में वो कहीं खो गया हो, वो परेशान है, जिस तरफ भी देखता है भीड़ ही भीड़ है, बहुत सारे लोग, कितना शोर मगर एक भी चेहरा जाना पहचाना नहीं |

वो बच्चा कितना डर गया है, कितना सहमा सा, लाचार नजरों से यहाँ वहाँ, इधर उधर कभी भागता है, कभी चीखता है कभी जोर जोर से रोता है | मन में इक उम्मीद है कि इस भीड़ में वो जाना पहचाना चेहरा मिल जाएगा, दिख जाएगा | सुबह से रात हुई, रात से फिर सुबह, कुछ दिन बीते फिर कुछ और दिन फिर हफ्ते उम्मीद साथ छोड़ने लगी, डर बढ़ने लगा |

बहुत भीतर बहुत अंदर तक वो डर उसका साथी बन गया वो लाचारी वो बेबसी उस पर हावी होने लगी, हावी हो ही गई है । इस से पहले कि डाक्टर उसे कुछ कहता, सहर न जाने क्यों बिना कुछ सुने कमरे से बाहर निकल गई, अपने में गुम, चलती रही और चलती रही और बस चलती रही जब तक कि उसकी साँस उखड़ने लगी और वो सड़क के बीचों बीच बेहोश होकर गिर पड़ी |

दोस्तो इसके आगे सहर के साथ क्या हुआ, पढिए अगले अंक में । अभी के लिए बस इतना ही

Guest Post by Pratyaya Singh

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