पहली फोन काल

एक काल्पनिक शहर, गुलक का एक किस्सा |


जिस तरह हर शहर, हर कस्बा, हर मोहल्ला न जाने कितने किस्से, कहानियाँ अपने में समेटे हुए रहता है, ठीक वैसे ही हर व्यक्ति अपने अंदर, अपने अंतर्मन में न जाने कितना कुछ संजोए,  कितना कुछ दुनिया से छुपाए रखता है। और जब कभी मन बाहरी दुनिया से थक जाता है, ऊब जाता है,  झूठी-सच्ची, दौडती-भागती, कभी रेत की तरह हाथ से फिसलती जाती जिंदगी के पीछे भागते भागते, कुछ पल सुकून के खोजने के लिये जाने-अनजाने अपने अंतर्मन में संजो कर रखे खूबसूरत पलों को जी जाता है |

ऐसे पल जो दिल को कभी गुदगूदा जातें हैं तो कभी प्यार में कुछ पल पिघला जाते हैं रोम रोम को। ऐसे ही लोगों कि खट्टे मीठे अनुभवों, यादों, किस्से, कहानियों को खुद में समेटे हुए है एक काल्पनिक शहर , गुलक, तो उसी गुलक में से एक किस्सा आपके लिए |

बात जनवरी के महीने की है, मैं गुलक शहर में अपने घर की बालकनी में अलसायी सी सुबह में गर्म चाय की चुस्कियां ले रही थी। इतने में फोन की घंटी बजी, इस से पहले कि मैं आगे बढ़कर फोन उठाती, फोन कट गया | मगर फोन की घंटी मुझे कुछ 22-23 साल पहले ले गई, शायद  1997 जनवरी में फोन लगा था हमारे घर, कुछ 20 जनवरी के आसपास था, उस की बहन की शादी का टाइम था। जैसे ही फोन लगा मैंने सबसे पहला फोन उसे ही लगाया था, पहला नम्बर जो मिलाया था वो उसी के घर का था |

कितना अजीब है न मुझे अपने घर का नम्बर नहीं याद मगर उसका याद है। शायद यही खुबसूरती है ऐसे रिश्तों की, प्यार की | फोन उसी ने उठाया था, और उठाते ही उसने ऐसे बात की जैसे कि वो जानता ही हो कि मैं हूँ (ये बात ज़हन में अभी आई, जब उस पल को फिर से जी रही हूँ) । एक अजीब सी हिचकिचाहट थी, दिल इतनी जोर से धडक रहा था कि मानो वो सारी दुनिया को पता चल जाएगा | अरे अभी भी उतनी ही तेज आवाज आ रही है धडकनों की…ऊफफफ

कुछ पल बात की (उस वक्त तो लगा था न जाने कब से सुन रही हूँ उसे) फिर किसी ने उसे आवाज़ लगाई और उस ने अचानक से कहा कि तुम केलकूलस की किताब ले आना कल, मैं डिपार्टमेंट में ही ले लूँगा तुम से | मैंने ठीक है कहा और रख दिया। केलकूलस की किताब कहाँ से आई पता नहीं, क्योंकि न मेरे पास और न ही उसके पास ये किताब थी।

अगले दिन हम कुछ सहेलियां डिपार्टमेंट की ग्राउन्ड में बैठी सर्दी की धूप का मजा ले रहीं थी, मैं, थी तो वहीँ मगर निगाहें बार बार डिपार्टमेंट के कॉरिडोर में उसके आने की राह तक रहीं थीं। कुछ देर में वो आया, और उसने आते ही पुछा ,असल में थोड़ा सा नीचे की ओर झुका और उसने मुझसे कहा कि कल तुमने फोन किया था? इस से पहले की मैं कुछ जवाब दे पाती उसने कहा कि मुझे लगा रमा (हमारी सहपाठी) ने किया था। यह सुनकर मैंने कोई जवाब नहीं दिया, मगर वहीँ एक और हमारी क्लास की ही वीना ने उस से कहा कि तू पुछता नहीं है कि कौन है बात करने से पहले?

उसने कोई जवाब नहीं दिया बस हल्का सा मुस्कुरा दिया, और वहां से चला गया। उस वक्त तो लगा था कि कल जो भी मैंने महसूस किया असल में वो मेरे लिए था ही नहीं |मन एकदम मायूस हो गया। दिल भी अजीब है एक पल में मन बिना किसी बात के ही खिल उठता है, खुश हो जाता है और कभी-कभी एकदम मायूस हो जाता है, रोने लगता है, दुखी हो जाता है |

लेकिन उसी दिन 4 बजे के आसपास वो मेरे साथ था, हम चाय पीने जा रहे थे | लाइब्रेरी से चाय वाले की ओर जा रहे थे, मैंने पुछा उस से क्या आपको वाकई नहीं पता चला कि फोन मैंने किया था? उसने हमेशा की तरह बिना कुछ कहे मेरी ओर देखा, मुस्कुराया, अपना दाईना हाथ बालों में फेरने लगा ओर पाँव से धीरे से कुछ आगे की ओर कुछ फेंका हो जैसे और बस, हमेशा की तरह बिना कुछ कहे ही वो कितना कुछ कह गया | फिर चाय पी, बातें की, मगर न उसने कहा कि हां कल तुम ही थी मैं समझ गया था, और न ही कहा मुझे सच में नहीं पता था और न मैंने फिर पूछा क्योंकि उसकी उस मुस्कुराहट में, मैं अक्सर पता नहीं कैसे सहरसी बन जाती थी |

आज भी सहरसी ही हूँ और ऐसे ही रहना है, इतने में ही एक बार फिर घंटी की आवाज़ से मैं कल से आज में आ गई। चाय कप में ठंडी हो गई थी, मगर ये पुरानी मीठी याद जरूर मेरे मन, मेरी रूह को सर्द मौसम में हल्की सी गरमाई दे गई थी। होठों पर फैली मुस्कान को लिए मैं रसोई की ओर एक प्यालागर्म चाय बनाने चल दी |

बस इतना सा ही था ये किस्सा |

Guest post by Pratyaya Singh

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