घर – गुलक शहर

वह सबसे ज्यादा सूखी है,जो अपने घर में शांति पाता है, फिर चाहे वो राजा हो या एक साधारण इंसान|

घर: एक अहसास है, एक emotion है। जो उसमें रहने वाले लोगों के खट्टे मीठे अनुभवों, हार- जीत, दुख-सुख साथ साथ जीने से बनता है। जब आप घर के अंदर दाखिल हो तो एक सुकून का अहसास हो। परेशानियाँ तो जिंदगी में लगी रहती हैं, अगर साथ मिलकर काम करें तो परेशानी कम हो न हो, पता नहीं, मगर कोई साथ है ये अहसास एक हिम्मत बांधे रखता है। जब एक छत के नीचे भी रहते हुए सब लोग अपनी अपनी तकलीफ़ों से अलग-अलग जूझते हैं तो एक अजीब सा माहौल बन जाता है घर में, एक अजीब सी घुटन पसर जाती है न केवल घर में, बल्कि उस घर में रहने वाले लोगों के जहन में, मन में।


न जाने आज क्यों जहन से निकाल ही नहीं पा रही थी ये सब, समीक्षा। इन सब में उलझी हुई थी कि समीक्षा को अपने पापा के घर की याद आ गई। उसके पापा का घर, उसका मायका गुलक शहर में एक छोटा सा, मगर खुशियाँ से, सुकून से भरा हुआ| उसे पता ही नहीं चला कब वो ये सब अपने जज्बात कागज पर उतारने लगी


कितना अलग माहौल था वहाँ, मां पापा का रिश्ता बहुत खुबसूरत था, एक दुसरे की परवाह दिखाई देती थी,  समस्या तो थी जिंदगी में,  मगर मैंने  उन्हें हमेशा मिलकर समाधान ढूंढते हुए देखा। मध्य वर्गीय परिवार था हमारा, जरूरतें पूरी हो जाती थी, पापा अकसर बिमार रहते थे, बस एक सरकारी नौकरी थी| कम ज्यादा चलता रहता था, मगर न तो कभी उधार लिया, न रिशवत | बस अपनी सुजबुझ से परिवार की सब जरूरतें पूरी कर देते थे। लेकिन घर में मैंने कभी इस बात को लेकर तनाव या कोई खिंचाव नहीं महसूस किया। मारा-मारी नहीं थी, पैसा जरूरी है, बहुत जरूरी है लेकिन मन में, घर में शांती होना सबसे ज्यादा जरूरी, सबसे अहम है।


मैं जब शादी करके ससुराल पहुंची थी, तो दुसरे ही दिन नौकरी का इंटरव्यू देने के लिए गई थी। उस घर में, ससुराल  में घर जैसा कभी कुछ लगा नहीं, वहाँ बस पैसा, पैसा और पैसा बस इसी की अहमियत देखी| कुछ हद तक तो मैं समझ सकती हूँ लेकिन हर वक्त, एक अजीब सी दौड़, हर पल बस भागो, भागो और भागो| जब तक भाग रही थी, ठीक थी फिर भागते भागते थकने लगी, कोफत होने लगी, सोचा कुछ देर रुकूगी, और जैसे ही रुकी, मैंने पाया कि अब मेरी कोई अहमियत ही नहीं है|


आज जहाँ मैं हूँ,  वहाँ बहुत कुछ है मगर सुकून नहीं है, प्यार, परवाह, सुख शांति सब आधा अधूरा है। खुश होना बस टलते हुए ही देखा है, बस ये हो जाए तो खुश होंगे, जब वो हो जाएगा तब खुश हो जाएंगे।  नतीजा यह है कि सब अपनी अपनी तकलीफ अकेले अकेले झेल रहे हैं मगर एक छत के नीचे रहते हुए, सुधीर, मेरे पति को परेशानी है कि यह कोई घर है और बिना किसी हिचकिचाहट के वो इस सब के लिए मुझे जिम्मेदार मानता है।


हां हूँ, हां मैं हूँ जिम्मेदार| छोड दी कोशिश काफी समय पहले से, जब मैं कोशिश कर रही थी तब तो धकेल दिया और अब, जब मैं खुद ही अंदर से टूट गई हूँ, बिखर गई हूँ, जब खुद को नहीं संवार पा रही, तो घर को कैसे बांधू। कैसे समझाऊँ कि मकान को घर बनाने के लिए जिम्मेदारी उस मकान में रहने वाले हर शख्स की है|


बस इतना सा ही था ये किस्सा, गुलक शहर के किस्सों की पिटारी से|

Guest post by Pratyaya Singh

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