खाली है जो तेरे बिना, मैं वो घर हूँ तेरा

जब भी इत्मीनान से खुद को सुलझाना चाहा, उतना ही जिन्दगी को उसमें उलझा पाया |
आज भी खुद को डिपार्टमेंट के कॉरिडोर में खडा पाते हैं, आज से आंख मिलाने पर पता चलता है कि हम कहाँ आ गए |

ऐसी जगह जहां कभी ना पहुंचना चाहा था, ना कभी सोचा था | शायद वकत ऐसे ही खेल सबके साथ खेलता है, देखने को हम यहाँ हैं मगर जिन्दगी और रूह तो वहीं कहीं अटकी है, जेसै पेड़ पर अटका चाँद | कई बार सोचा जिन्दगी को आज में ले आएं, मगर ये अब मुमकिन कहाँ |

जिन्दगी वहाँ कितनी सुकून में है, जब वहाँ होते हैं तो सब कितना आसान, कितना खुबसूरत, कितना शांत लगता है | वहाँ सिर्फ हम हैं और कोई नहीं, सिर्फ दो लोग भी मिलकर एक सम्पूरण जीवन जी सकते हैं |


मगर आज में आते ही सब एक रिवायत से ज्यादा कुछ नहीं लगता, भीड़ भी साथ आ जाए तो भी सिर्फ जीवन साँस लेने से बढकर कुछ नहीं | ऐसा क्यों होता है कि कभी-कभी किसी किसी की या फिर सभी की जिन्दगी किसी एक, किसी उस एक में ही सिमट जाती है |

क्यों ऐसा है कि सिर्फ एक उसे भुलाना ही नामुमकिन हो जाता है, वो मिल ना पाये तो क्यों हम वहीँ उस मोड़ पर खड़े रह जातें हैं जहां से उसने हमें छोड़ दिया था, या हम छूट गए थे | क्या उसके इंतजार में?? मगर यह कहानी नहीं, वास्तविकता है, और इस में कहाँ कोई पलट कर पल भर के लिये भी आता है ?? यह सब मालूम होने पर भी क्यों वहीं खड़े हैं |


क्या है ये उलझन, एक उम्र गुजर जाने पर भी क्यों मुश्किल है आज में खुद को ले आना?? क्या है, जो आज भी वहीं अटका है, वहीं बंधा हुआ है

आनंद बख्शी ने बहुत खूब लिखा है :


जिस पे हम मर मिटे उसे पता भी नहीं,

क्या गिला हम करें वो बेवफा भी नहीं, 

हमने जो सुन लिया उसने कहा भी नहीं


अब इस उम्र में ये सब कहाँ सही है, मगर क्या करें आज भी इस बात का इंतजार है कि हमने ता-उम्र भ्रम पाला या फिर संजोग था मगर संजोग में नहीं था | इक तरफा शायद हो दिल का भरम, दो तरफा है तो ये संजोग है | उसका इंतजार आखिरी पल तक रहेगा

मैं मर जाऊँ ,
तो मेरी आँखे बंद मत करना ,
क्या पता वो मेरे जनाजे को देखने आये


आखिर में, कातिल शिफाई ने बहुत खूब लिखा है-


आखरी हिचकी तेरे ज़ानो पे आये,
मौत भी मैं शायराना चाहता हूँ…

— Guest post by Pratyaya Singh

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