उलझन सुलझे ना

चले थे घर से उम्मीद में कि उलझन को सुलझा लेंगे, खुद को कल से आज में ले आएंगे मगर ये तो ओर उलझ गए | शायद खुद को उसमें उलझाये रखना ही नियति है मेरे लिए |


अगर गहराई से सोचा जाए तो उलझन कहाँ है ये, उलझन तो तब तक होती है जब आप वास्तविकता और मृगतृषणा में अंतर न कर पाएं । सही अर्थ में सोचा, देखा जाए तो वास्तविकता और मृगतृषणा हर किसी का अपना व्यक्तिगत अनुभव है, ये आप और केवल आप निश्चित कर सकते हैं कि आपकी जीवन की क्या हकीकत है और क्या नहीं, कोई और ये केसै तय कर सकता है?


यहाँ एक प्रशन और उतपन्न होता है कि हकीकत सिर्फ वो ही  है जो आँखे देख पाती हैं या वो जो रूह की आखों से भी दिखाई देती है ? क्या यह संभव नहीं कि जो लोगों के लिए आपकी वास्तविकता, हकीकत है असल में वो आपकी मृगतृषणा हो, और आपकी हकीकत लोगों की नजरों में एक मृगतृषणा से अधिक कुछ और नहीं?


तो फिर हम किसी और को यह तय करने का हक केसै दे सकते हैं कि वो हमें हमारी हकीकत से रूबरू कराने की कोशिश करे? आखिर हमे किसी और की राय या स्वीकृति की आवश्यकता ही क्यों होती है? शायद हमें बचपन से यही सिखाया गया है कि आपकी वही हकीकत है, जो दूसरों को माननिए हो? और शायद इसीलिए हमें दूसरों की स्वीकृति की इतनी जरूरत महसूस होती है ।
शायद इसीलिए मैं भी जाने अनजाने में निकल पड़ी घर से उलझन को सुलझाने, बिना यह समझे उलझन है भी या फिर यह दूसरों की नजरों में उलझन है जिसे सुलझाना जरूरी है?


अगर हम भौतिकवादी स्तर पर एक जीवन जी रहें हैं और रूहानी स्तर पर दूसरा तो क्या इसे उलझन कहना सही होगा? मेरा मानना है कि जब तक दोनों अपने-अपने स्तर पर बिना एक दूसरे के लिए बाधा बने जी रहे हैं तब तक इसे उलझन का नाम देना सही नहीं होगा |

Guest post by Pratyaya Singh 

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