अजीब नियम भारतीय महिलाओ के लिए

भारत संस्कारो का देश है | यहाँ की सभ्यता और संस्कृति, इसे विरासत में मिली है | अपने इन्ही गुणों की वजह से, ये पुरे विश्व में अपनी अलग पहचान कायम किए हुए है | सिंधु घाटी की सभ्यता को मानव इतिहास की सबसे पुरानी सभ्यता के रूप में जाना जाता है | ये सभ्यता हिंदुस्तान से जुडी हुई है इस कथन के साथ ही मनोज कुमार का एक गाना याद आता है – ”सभ्यता जहा पहले आई पहले जन्मी है जहा पे कला अपना भारत वो भारत है, जिसके पीछे संसार चला ” ये पंक्तिया अपने आप में भारत की सभ्यता का गुणगान करती है |

ये एक ऐसा देश है, जहाँ हर इंसान दूसरे में भगवान् देखता है, जहाँ स्त्रियों की तुलना माँ भगवती से की जाती है | उनके सम्मान में हर नवरात्री पर कन्या पूजन का विधान है | कोई भी पूजा या शुभ कार्य कन्या पूजन के बिना अधूरा है | हमारे धर्मो में भी कहा गया है – “यत्र नार्यस्तु पूज्यन्ते रमन्ते तत्र देवता यत्रैतास्तु न पूज्यन्ते सर्वस्त्राफलाह क्रिया” अर्थात जिस घर में नारी का सम्मान होता है वहाँ भगवन निवास करते है | तथा जिस स्थान में नारी का अपमान हो वहाँ सभी पुण्य फल नस्ट् हो जाते है | मतलब किसी पूजा का कोई फल प्राप्त नहीं होता | हमारे देश में नारियो के सम्मान पर बहुत बाते होती है, यहाँ तक की चुनाव प्रचार पे भी नारी के सुरक्षा और सम्मान की तर्ज पर वोट मांगे जाते है |  जमीनी हक़ीक़त क्या है, क्या धार्मिक और सामाजिक बातो को ध्यान में रख के स्त्रियों को वही सम्मान प्राप्त हो रहा है जिसकी वो हक़दार है ? क्या सुरक्षा की दृष्टि से कोई कदम उठाए जा रहे है ? नहीं ! चलिए आज बात करते है कुछ अजीब भारतीय नियमो की जो सिर्फ स्त्रियों पर लागु होते है |

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  • घर के काम सिर्फ औरतो के हिस्से– आज के समय में औरते मर्दो के मुकाबले अधिक सफल है, हर क्षेत्र में हर फील्ड में औरतो ने अपना लोहा मनवाया है | चाहे वो पहली महिला प्रधानमंत्री श्रीमती इंदिरा गाँधी हो, अंतरिक्ष में जाने वाली कल्पना चावला हो पहली भारतीय महिला आई पी ऐस किरण बेदी जी हो या स्पोर्ट्स में अपना नाम कमाने वाली सानिया मिर्ज़ा ,साइना नेहवाल या स्मृति मंदाना हो अभिनय के क्षेत्र में दीपिका पादुकोण, ऐश्वर्या राय जैसी अभिनेत्रियों ने देश के साथ साथ विदेश में भी अपना नाम रोशन किआ है | इन सबके बाद भी घर की पूरी जिम्मेदारी सिर्फ औरतो पे, बचपन से ही हमे सिखाया जाता है, की घर के काम औरतो को ही करने होते है |जब औरते मर्दो के साथ बहार के काम कर सकती है, तो मर्द क्यू घर में अपनी पत्नियों का हाथ नहीं बटा सकते? हर माँ बाप को चाहिए की वो बचपन से ही अपने बेटो और बेटियों में फर्क ना करे, कोई काम सिर्फ औरतो के नहीं है, इसकी शिक्षा अपने बेटो को दे ताकि इस क्षेत्र में सुधार आ सके |                                           work
  • वेतन में असमानता- ये स्थिति सिर्फ भारत में में नहीं, बल्कि पुरे विश्व में है यहाँ औरतो को आदमियों के हिसाब से कम वेतन दिए जाता है |चाहे आप कोई भी फील्ड ले ले, जबकि आज के युग में महिलाए पुरुषो से कंधे से कन्धा मिला के हर कार्य करने में सक्षम है | उसके बाद भी उन्हें कम वेतन दिआ जाता है | जबकि ये कई बार सिद्ध हो चूका है ,की औरते अपना काम पुरुषो के मुकाबले ज्यादा निष्ठां से करती है                                          gender-pay-gap
  • डोंट टच रूल इन पीरियड्स– भारत में आज भी पीरियड को लेके बहुत साऱी भ्रान्ति है ,जैसे की आप मंदिर नहीं जा सकते, खाना नहीं बना सकते, कई जगहों पे औरतो को जमींन पे सुलाया जाता है , अचार पापड़ हाथ नहीं लगा सकते ,आज भी लोगो का मानना है की माहवारी के समय महिलाए अपवित्र हो जाती है | इसलिए वो न ही मंदिर जा सकती है, न पूजा पाठ कर सकती है, और न ही खाना बना सकती है | आज विज्ञानं ने इतनी तरक्की कर ली है ,हम सभी जानते है की माहवारी एक सामान्य प्रक्रिया है, पर फिर भी ये सारे नियम मानने पे मजबूर है |
  • ये घर तुम्हारा नहीं है– जो औरते मक़ान को घर बनाती है, उन्हें ही हर बार ये सुनने को मिलता है की ये घर तुम्हारा नहीं है | क्या औरतो का अपना कोई घर नहीं होता ? और चलिए ठीक है माना भी की नहीं होता फिर क्यू उनसे उम्मीद की जाती है, की वो घर की सारी  जिम्मेदारी संभाले वो भी उस घर की जो उनका है ही नहीं, शायद ही कोई लड़की हो जिसने बचपन से माँ से न सुना हो अपने घर चले जाओ तो करना अपने मन की ,या तुम पराई हो ये घर तुम्हारा नहीं |और शादी के बाद ससुराल जाते ही वहाँ सुनने को मिलता है ये तम्हारा घर नहीं, अगर अपने मन का ही करना है तो चले जाओ अपने घर| अरे भाई चलो मान लिआ, ये हमारा घर नहीं ,हम पराए है ,हम मेहमान है, तो बस इस एक सवाल का जवाब दे दो, कोई मेहमानो से भी इतना काम करवाता है क्या ?
  • आप खुद कोई फैसला नहीं ले सकते– हमारे देश में औरतो को उनकी खुद की जिंदगी के बारे में भी फैसला लेने का कोई अधिकार नहीं |उन्हे कहा पढ़ना है ,किस्से शादी करनी है ,कब करनी है, क्या पहनना है ,किससे बात करनी ,ये फैसले भी वो खुद नहीं ले सकती |पैदा होते ही उनकी जिंदगी के बारे में फैसले लेने का अधिकार पिता के हाथ चला जाता है | कुछ समय बाद भाइयो द्वारा उन्हें कपडे पहनने ,बाहर जाने के लिए रोक टोक का सामना करना पड़ता है| और शादी के बाद तो उनका पति ही , उनकी जिंदगी का मालिक बन जाता हैं| यहॉ तक की अपने माँ बाप से मिलने के लिए भी उसे पति की आज्ञा की जरुरत पड़ने लगती है | अपनी किस्मत को कोसते हुए जैसे तैसे बुढ़ापे की और जाती है, तब भी उन्हें अपने बेटो की रोक टोक का सामना करना पड़ता है |

 

                      इसके बाद भी आप कहेंगे ,भारत में औरतो को सम्मान मिलता है |यहाँ पे दिए जाने वाला सम्मान सिर्फ किताबो और बातो तक ही सीमित है | सच में इस देश में औरतो का सम्मान होता, तो आए दिन कन्या भ्रूण हत्या , दहेज़ लोभियो द्वारा हत्या, रेप घरेलु हिंसा की खबरे सुंनने को नहीं मिलती |जिस देश में औरत अपनी जिंदगी का फैसला तक खुद न ले सके, उस देश के मुँह से आधुनिकता की बाते शोभा भी नहीं देती, अगर सच में अपने देश की सभ्यता और संस्कृति को बचाए रखते हुए, आधुनिकता की और बढ़ना है, तो यहाँ के हर नागरिक को औरतो का सम्मान करना सीखना होगा |

 

 

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