अंतरराष्ट्रीय महिला दिवस

हर वर्ष की तरह इस वर्ष भी आज के दिन यानी 8 मार्च को अंतरराष्ट्रीय महिला दिवस के रूप में मनाया जाता है। कुछ पुरुषों को वैसे इस बात से भी तकलीफ है की सिर्फ महिला दिवस ही क्यों मनाया जाता है पुरुष दिवस क्यों नही, खैर छोड़िए ये बात करते है महिला दिवस की क्यों साल में ही एक दिन याद किया जाता है | किसी महिला के द्वारा किए गए कार्यों को क्यों बाकी दिनों में भुला दिया जाता है इस समाज में महिला के योगदान को।

खैर मुझे तो ये महिला दिवस का मतलब ही आज तक समझ नही आया हम बात करते है, महिला के बराबरी के अधिकारों की जबकी आज भी स्थिति ये है की कन्या को जन्म ही नही लेने दिया जाता, किसी तरह जन्म हो भी जाए, तो पढ़ाई पूरी करने नही दी जाती पढ़ ले, तो बराबरी की नौकरी समान वेतन नही मिलता। आज के ही आंकड़े मैं बता रही हूं,

केंद्रीय मंत्रालय की रिपोर्ट के अनुसार देश में सिर्फ 13% महिलाएं सीनियर पदो पर है, जबकि बाकी की 87% पे अब भी पुरुषो का अधिकार है, देश में 40% लड़कियों की पढ़ाई 10 के बाद छुड़वा दी जाती है। दुनिया में सबसे ज्यादा जेंडर गैप वाले 153 देशों में भारत 112वे नंबर पे है।

सरकारी कानून के हिसाब से संपत्ति पर महिलाओं का भी अधिकार है, पर आंकड़ा कहता है देश में सिर्फ 17% संपत्ति पर महिलाओं का हक है |

संवेदनशील पुरुष बिरादरी ने बड़ी चालाकी से महिलाओं के हाथ महिला दिवस के नाम की ढपली पकड़ा दी है जिसे हर वर्ष एक दिन मना कर इतना शोर निकाला जाता है की सालभर औरतों में बराबरी का चाव उस दिन में पूरा हो जाए हर साल सिर्फ साल ही बदल रहा है

किंतु औरतों को लेकर हमारी सोच जहां की तहां है |शादीशुदा औरते हमेशा सौभाग्यवती का आशीर्वाद पाती है जबकि पुरुष चिरंजीवी होने का इस आशीर्वाद से खुश होने वाली औरते ये भुला देती है की इसका अर्थ है चाहे जितना लंबा जियो लेकिन पति से पहले मरना ये है देश में महिला की स्थिति जहां आशीर्वाद तक में भेदभाव है आशीर्वाद के साथ साथ औरतों के लिए अनेक तरह के व्रत पूजन निर्धारित कर दिए गए आप कोई भी उठा के देख ले वो पति संतान की दीर्घायु और परिवार की सुख शांति के लिए है दूसरी ओर ऐसा कोई व्रत नहीं जो पत्नी बेटी या मां के लिए रखा जाता हो और सच कहे तो समाज को इसकी जरूरत ही कहा औरत की सुरक्षा और जीवन आखिकार मर्दों के हाथो में ही तो है।

कभी मां बाप की इज्जत, कभी पति की इज्जत का सारा भार एक महिला के कंधे पे रख कर उसकी आजादी को छीनने की कोशिश की जाती है, अपने हक और अधिकारों की बात करने पर उसे चरित्रहीन साबित करने में भी ये समाज एक पल की भी देरी नही लगाता | हाल ही मैंने किसी महात्मा को कहते सुना की जो की एक दोहे का अर्थ साझा कर रहे थे जो की इस प्रकार था –

“ढोर गवार शुद्र पशु नारी सकल ताड़ना के अधिकारी” इसके अर्थ में महात्मा जी कह रहे थे की इसमें नारी के तारण का अर्थ है उसपर निगरानी रखना अपने वाक्य को सही साबित करने के लिए उन्होंने औरत की तुलना कीमती जवाहरात से कर दी सबसे ज्यादा आश्चर्य मुझे इस बात पे हुआ की वहा बैठी महिलाओं ने सहमति में सर हिलाया विरोध नही किया मतलब एक औरत जेवरो की तरह कैद में भी रहने को तैयार है बशर्ते उसकी तुलना कीमती सामान से कर दी जाए। कहीं सुना था मैने की एक औरत ही दूसरी औरत की सबसे बड़ी दुश्मन है उनके व्यवहार ने ये साबित भी कर दिया।

बचपन से ही मां अपनी बेटी को मर्यादा में रहना, लोगो से ज्यादा बाते न करना, रास्ते में नजर झुका के चलना, ससुराल में कोई तकलीफ हो तो एडजस्ट करना कुल मिला के उसे बचपन से ही कमजोर होने की शिक्षा दी जाती है और हम महिला समानता की बाते कर रहे, बेटियो को बचपन से मन में डाल दिया जाता है की यहां से डोली उठेगी अर्थी ससुराल से उठे अपनी इज्जत का हवाला देकर मजबूर किया जाता है हर तरह के जुर्म सहने को, आयशा की कहानी से हम सभी वाकिफ है एक लड़की जिसे बचपन से ही प्यार करना सहन करना सिखाया जब अपने पति की बेवफाई और दुत्कार बर्दास्त न कर सकी तो साबरमती नदी में कूद कर जान दे दी अब यहां तो सारे सबूत थे लड़के ने खुद कबूल भी किया की उसने आत्महत्या के लिए उकसाया है वरना हमारा सभ्य समाज आत्महत्या के लिए आयशा को ही जिम्मेदार समझता उसके चरित्र और परवरिश पे उंगली उठाता, आज माता पिता उसे इंसाफ दिलाना चाहते है पर सच तो ये है जितना उसका पति दोषी है उससे कहीं ज्यादा दोष उसके माता पिता का है जो आखिरी फोन कॉल पे भी उसे सब्र रखने को कह रहे थे लड़के से बात करके हल निकालने का कह रहे थे, आयशा पति की बेवफाई से नहीं मारी गई अपने माता पिता के रवैए से मारी गई जो इतना होने के बाद भी उसे शादी बचाने की बाते कर रहे थे।

इस समाज ने महिलाओं के लिए इतने नियम निर्धारित कर दिए है की उनसे लड़ पाना ही आसान नहीं अगर कहीं कुछ भी गलत होता है तो उंगलियां लड़कियों पे उठा दी जाती है लड़का रात को देर से घर आ सकता है दोस्तो के साथ घूमने जा सकता है यहां तक जो मर्जी आए कर सकता है और अगर कोई लड़की ये करे तो उसे चरित्रहीन घोषित कर दिया जाता है खैर मुझे पता है हर वर्ष की तरह ही महिला अधिकार,सम्मान बराबरी की बाते होगी हर व्यक्ति के सोशल अकाउंट पे अपनी जिंदगी से जुड़ी महिलाओं को धन्यवाद करते तस्वीरे होंगी पर उनकी सोच में आज भी कोई परिवर्तन नहीं स्टेटस लगा के फर्ज निभा दिया भले ही अपनी जिंदगी से जुड़ी किसी न किसी महिला का अपमान किया हो उसके स्वाभिमान को चोट पहुंचाई हो पर हम बन गए आज के लिए महान धन्यवाद

अंतरराष्ट्रीय महिला दिवस की बहुत बहुत शुभकामनाएं

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